गणगौर तीजः इस दिन सुहागिन महिलाएं करती है व्रत, मिलता है अखंड सौभाग्यवती का वरदान
गणगौर तीज का व्रत 8 अप्रैल 2019 को रखा जाएगा। चैत्र शुक्ल नवरात्रि की तृतीया तिथि को गणगौर पर्व मनाया जाता है। इस दिन महिलाएं अपने सुहाग की लंबी उम्र के लिए सोलह श्रृंगार कर भगवान शिव और पार्वती की पूजा करती हैं। गणगौर पर्व खासतौर पर राजस्थान में मनाया जाता है, इसके अलावा भारत के अन्य हिस्सों में भी महिलाएं गणगौर मनाती है। यह पर्व चैत्र कृष्ण प्रतिपदा से 16 दिवसीय गणगौर पूजा पर्व की शुरुआत हो जाती है। सुहागिन महिलाएं इस व्रत को अपने पति की लंबी आयु और सुखद वैवाहिक जीवन के लिए करती है, वहीं अविवाहित कन्याएं मनोवांछित वर पाने के लिए गणगौर वर्त रखती है।
इस पर्व के दिनों में कुंवारी और विवाहित महिलाएं, नवविवाहिताएं प्रतिदिन गणगौर पूजती हैं तथा वे चैत्र शुक्ल द्वितीया (सिंजारे) के दिन किसी नदी, तालाब या सरोवर पर जाकर अपनी पूजी हुई गणगौरों को पानी पिलाती हैं और दूसरे दिन शाम के समय उनका विसर्जन कर देती हैं।
धर्म संस्कृति में यह व्रत विवाहित महिलाओं के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना गया है, इससे सुहागिनों का सुहाग अखंड रहता है और कुंवारी कन्याओं को मनपसंद जीवनसाथी मिलता है। इस दिन भगवान शिव ने पार्वतीजी को तथा पार्वतीजी ने समस्त स्त्री-समाज को सौभाग्य का वरदान दिया था। इस दिन सुहागिनें दोपहर तक व्रत रखती हैं। महिलाएं नाच-गाकर, पूजा-पाठ कर हर्षोल्लास से यह त्योहार मनाती हैं।
गणगौर व्रत कैसे करें
1. चैत्र कृष्ण पक्ष की एकादशी को प्रातः स्नान करके गीले वस्त्रों में ही रहकर घर के ही किसी पवित्र स्थान पर लकड़ी की बनी टोकरी में जवारे बोना चाहिए।
2. इन जवारों को ही देवी गौरी और शिव या ईसर का रूप माना जाता है।
3. इस दिन से विसर्जन तक व्रती को दिन में केवल एक बार ही दूध पीकर इस व्रत को करना चाहिए।
4. सुहाग की सामग्री को चंदन, अक्षत, धूप-दीप, नैवेद्यादि से विधिपूर्वक पूजन कर गौरी को अर्पण किया जाता है।
5. गौरीजी की इस स्थापना पर सुहाग की वस्तुएं जैसे कांच की चूड़ियां, सिंदूर, महावर, मेहंदी, टीका, बिंदी, कंघी, शीशा, काजल आदि चढ़ाई जाती हैं।
6. इसके पश्चात गौरीजी को भोग लगाया जाता है और भोग के बाद गौरीजी की कथा कही जाती है।
7. कथा सुनने के बाद गौरीजी पर चढ़ाए हुए सिंदूर से विवाहित स्त्रियों को अपनी मांग भरनी चाहिए।
8. चैत्र शुक्ल द्वितीया (सिंजारे) को गौरीजी को किसी नदी, तालाब या सरोवर पर ले जाकर उन्हें स्नान कराएं।
9. चैत्र शुक्ल तृतीया को भी गौरी-शिव को स्नान कराकर, उन्हें सुंदर वस्त्राभूषण पहनाकर डोल या पालने में बिठाएं।
10. इसी दिन शाम को एक शोभायात्रा के रूप में गौरी-शिव को नदी, तालाब या सरोवर पर ले जाकर विसर्जित करें।
11. विसर्जन के बाद इसी दिन शाम को उपवास भी खोला जाता है।
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