Krishna Janmashtami 2021: क्यों श्रीकृष्ण ने जन्म के लिए चुना था रात्रि 12 बजे का समय और बुधवार का दिन - Web India Live

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Krishna Janmashtami 2021: क्यों श्रीकृष्ण ने जन्म के लिए चुना था रात्रि 12 बजे का समय और बुधवार का दिन

Krishna Janmashtami 2021: नई दिल्ली। भगवान विष्णु के आठवें अवतार भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव जन्माष्टमी पूरे देश में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है परन्तु क्या आप जानते हैं कि उन्होंने अपने जन्म का समय आधी रात को रोहिणी नक्षत्र में ही क्यों चुना? इसके पीछे कई मान्यताएं प्रचलित हैं। यहां हम ऐसी ही कई मान्यताओं के बारे में पढ़ेंगे जिनसे पता लगेगा कि क्यों कृष्ण का जन्म भाद्रपद माह की मध्यरात्रि में, रोहिणी नक्षत्र और अष्टमी तिथि को हुआ था। इन तथ्यों के बारे में शायद आप भी नहीं जानते होंगे।

भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष को इसलिए चुना
संस्कृत में भद्र का अर्थ कल्याण करने वाला होता है। कृष्ण का अर्थ काला है, अत: उन्होंने भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष को अपने जन्म के लिए चुना।

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अष्टमी तिथी को इसलिए हुआ था उनका जन्म
सनातन परंपरा में आठ को पूर्ण अंक माना गया है। कृष्ण अवतार भगवान विष्णु का आठवां ही अवतार था। वह अपनी समस्त सोलह कलाओं सहित जन्मे थे जो उन्हें पूर्ण अवतार बनाता है। इसके अतिरिक्त अष्टमी पूर्णिमा तथा अमावस्या के ठीक बीच का मध्यभाग है अर्थात् दोनों पक्षों का ठीक मध्य।

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रात्रि को जन्म के लिए इसलिए चुना
योगियों को रात्रि अत्यन्त प्रिय होती है। जब सारा संसार सो रहा होता है तब योगी ईश्वर की आराधना में लीन होते हैं। रात्रि का मध्यभाग अर्थात् निशीथ काल दो दिनों की संधि है। इस अवसर पर श्रीकृष्ण के प्रकट होने का अर्थ है- अज्ञान के घोर अंधकार में दिव्य प्रकाश का आना।

इसके अलावा भगवान कृष्ण के माता-पिता को कारागार में बंद रखा गया था ताकि उनकी सभी आठ संतानों का वध कर कंस स्वयं को अमर बना सकें। ऐसे में रात्रि का समय ही जन्म के लिए सर्वोत्तम था। सभी लोग सो रहे थे, लोगों का आवागमन कम से कम था, ऐसे में वसुदेव के लिए कृष्ण को कारागार से बाहर निकालकर गोकुल ले जाना आसान हो गया था, यदि भगवान का जन्म दिन में हुआ होता तो वह इतनी सहजता से कृष्ण को नहीं ले जा पाते।

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रोहिणी नक्षत्र को इसलिए चुना
इसी तरह उनके पिता वसुदेव की दो पत्नियां थी, पहली रोहिणी तथा दूसरी देवकी। उन्होंने देवकी के गर्भ से जन्म लिया तो उनकी दूसरी पत्नी रोहिणी को संतुष्ट करने के लिए ही उन्होंने रोहिणी नक्षत्र को चुना। इसके अलावा एक मान्यता यह भी है कि रोहिणी को चन्द्रमा की सर्वाधिक प्रिय पत्नी माना गया है।

ज्योतिष की दृष्टि से देखें तो रोहिणी नक्षत्र को आध्यात्म से जुड़ा नक्षत्र माना गया है। इसके अधिपति सृष्टि की रचना करने वाले ब्रह्मा जी हैं। इस नक्षत्र में जन्म लेने वाला व्यक्ति असाधारण रूप से प्रतिभाशाली होता है। वह आध्यात्मिक जीवन जीने वाले, मनमोहक, दयालु तथा महान गुणों से संपन्न होता है। यही कारण था कि अपने अन्य अवतारों की तुलना में कृष्ण केवल एक रूप में नहीं दिखाई देते वरन वह कभी बालकृष्ण के रूप में नटखट लीला करते हैं तो कभी गोपियों के साथ रासलीला और कभी अर्जुन के सारथी बन कर महाभारत में कौरव सेना का नाश करते हैं।

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जन्म के लिए कौनसा वार चुना
हरिवंशपुराण तथा भागवत पुराण के आधार पर कुछ ज्योतिषियों ने भगवान कृष्ण की जन्मतिथि का बिल्कुल सटीक पता लगाने का प्रयास किया है। इसके अनुसार माना जाता है कि उनका जन्म 19 जुलाई अथवा 20 जुलाई 3228 BCE को हुआ था और उस दिन शनिवार अथवा रविवार था। हालांकि कुछ अन्य ज्योतिषियों के अनुसार उनका जन्म बुधवार को हुआ था। ऐसे में स्पष्ट प्रमाण के अभाव में यह नहीं कहा जा सकता कि उनका जन्म किस वार को हुआ था। फिर भी अधिकतर ज्योतिषियों की राय मानते हुए कुछ लोग उनका जन्म बुधवार को ही होना सुनिश्चित करते हैं।

चन्द्रवंश को ही क्यों चुना
पौराणिक कथाओं के अनुसार चंद्रदेव की इच्छा थी कि भगवान विष्णु चंद्रवंश में अवतार लेकर उन पर अनुग्रह करें। अत: उन्होंने चंद्रवंश में जन्म लिया।

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