मौत का कारण मालूम, फिर भी पोस्टमार्टम, 70 फीसदी मामलों में तो जरूरत ही नहीं
भोपाल. हमीदिया अस्पताल की मर्चुरी में सोमवार को पोस्टमार्टम को लेकर विवाद की स्थिति बन गई। पांच घंटे तक इंतजार के बाद भी जब नंबर नहीं आया तो परिजनों ने मर्चुरी कर्मचारियों से विवाद करना शुरू कर दिया। कर्मचारी समझा रहे थे कि जब नंबर आएगा तभी पोस्टमार्टम हो सकेगा। वहां मौजूद अन्य लोग और पुलिसकर्मियों के समझाने के बाद परिजन मान गए। बेशक विवाद ज्यादा बड़ा नहीं था लेकिन इस तरह के विवाद यहां आम हैं।
दरअसल, हमीदिया अस्पताल की मर्चुरी में हर रोज 15 से 20 पोस्टमार्टम किए जाते हैं। इनमें से 70 फीसदी ऐसे मामले होते हैं, जिसमें मौत का कारण स्पष्ट पता होता है। इसके बावजूद पुलिस के दवाब में पोस्टमार्टम करना पड़ता है।
मालूम हो कि प्रदेश में हुई कोई भी बड़ी घटना के बाद गांधी मेडिकल कॉलेज स्थित मेडिकोलीगल संस्थान में ही पोस्टमार्टम के लिए भेजा जाता है। लेकिन यहां पहले से ही पोस्टमॉर्टम की संख्या इतनी ज्यादा है कि कई महत्वपूर्ण मामलों की रिपोर्ट महीनों पेंडिंग हो जाती है।
एक डॉक्टर दिन में 10 से 15 पीएम करता है
मेडिकोलीगल डिपार्टमेंट से मिली जानकारी के मुताबिक डॉक्टरों को मृत्यु का कारण पता होतो पोस्टमार्टम करना जरूरी नहीं है। करंट के अलावा फांसी, दुर्घटना, सांप के काटने, जलने के साथ हेड इंजुरी में पोस्टमार्टम की जरूरत नहीं होती। सुप्रीम कोर्ट ने शवों के सम्मान की बात करते हुए गैरजरूरी पोस्टमार्टम पर रोक लगाई है। इस निर्णय के बाजवजूद मप्र में इस पर कोई अमल नहीं होता। विशेषज्ञों की मानें तो पूरा पोस्टमार्टम करने में 3 घंटे लगते हैं। हमीदिया में एक डॉक्टर दिन में 10 से 15 पोस्टमार्टम तक कर रहे हैं।
अक्सर होते रहते हैं विवाद
यह सही है कि ऐसे विवाद अक्सर होते रहते हैं। दरअसल, हमारे यहां उन मामलों में भी पोस्टमार्टम कराए जाते हैंं, जिसका कारण सबको पता है। संस्थान में चार साल से चार पद खाली हैं, और पोस्टमार्टत तीन गुना । ऐसे में डॉक्टरों पर दवाब के साथ गुणवत्ता भी प्रभावित होती है।
- डॉ. अशोक शर्मा, डायरेक्टर मेडिकोलीगल संस्थान, भोपाल
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