कई बच्चे पहली बार स्कूल आ रहे, उन्हें पुराना याद ही नहीं
भोपाल। चाइल्ड राइट्स आब्जर्वेटरी और यूनीसेफ ने 'सीखने-सिखाने में आ रही चुनौतियों पर बच्चों और शिक्षकों से संवाद' विषय पर एक परिचर्चा का आयोजन किया। आब्जर्वेटरी की अध्यक्षा निर्मला बुच ने कहा कि लगभग 18 महीनों के बाद स्कूल खुले हैं और जो चुनौतियां सामने आईं हैं उनसे निपटना हम सब की जिम्मेदारी है। कोविड के कारण अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग अनुभव हुए हैं। बच्चे और शिक्षक इन परिस्थितियों में मुख्य एक्टर हैं। मुझे उम्मीद है कि हम सब मिलकर शिक्षा की इस चुनौती को अवसर के रूप में बदलेंगे और आगे बढ़ेंगे।
इस मौके पर राज्य बाल संरक्षण आयोग के सदस्य ब्रजेश चौहान ने कहा कि शिक्षकों के परिश्रम से ही बच्चे पढऩे में सक्षम हो पा रहे हैं। कक्षा एक से पांच तक के बच्चों के सामने कठिनाइयां यह है कि वे पुराना सब भूल गए हैं। कक्षा-तीन के बच्चे तो पहली बार स्कूल आ रहे हैं। ऐसी विषम परिस्थितियों में शिक्षकों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है।
उन्होंने कहा कि शिक्षक बच्चों के साथ-साथ उनके माता-पिता और परिजनों से जुड़े, उनसे बात करें तब ही गांव के बच्चे स्कूल आ पाएंगे। उन्होंने शिक्षकों और बच्चों को आश्वस्त किया कि वे उनकी पाठ्यक्रम कम करने और अचीवमेंट परीक्षाओं को बाद में आयोजित करने के संबंध में शासन से बातचीत करेंगे। यूनीसेफ की एफए जामी ने कहा कि शिक्षक खुलकर उन विषयों के बारे में बताएं ताकि समस्याओं के निराकरण के प्रयास हो सकें।
बच्चों ने ये चुनौतियां रखी सामने
बच्चों ने बताया कि परिवार में एक ही मोबाइल था जिसके कारण तीन भाई-बहन ऑनलाइन कक्षाओं में शामिल नहीं हो सके। कक्षा-9 में पढ़ाई ठीक से नहीं हो सकी इसलिए कक्षा-10 में परेशानी हो रही है। पहले की पढ़ाई कैसे पूरी करें। ऑनलाइन कक्षाओं में बहुत कुछ मिस हो जाता था, अब स्कूल खुले हैं तो अच्छे से समझ में आने लगा है। ऑनलाइन पढ़ाई और स्कूल में जाकर पढ़ाई में सामंजस्य स्थापित नहीं हो पा रहा है। अतिरिक्त कक्षाएं लगाई जाएं ताकि जो पाठ्यक्रम पिछड़ गया है वह पूरा हो सके।
शिक्षकों ने बताई ये समस्याएं
वहीं, शिक्षकों ने बताया कि कोविड में बच्चे पढ़ाई में पिछड़ गए हैं, उन्हें पुराना कोर्स भी कवर करना है। पाठ्यक्रम को कम किया जाना चाहिए। प्राइमरी के बच्चों को देरी तक स्कूल में रूकना पड़ता है। स्कूल का समय कम हो। नेशनल अचीवमेंट सर्वे के लिए हो रहीं परीक्षाएं वर्तमान समय में उपयुक्त नहीं है। अभी बच्चों को स्कूल लाने के लिए प्रेरित करना जरूरी है न की परीक्षाएं लेना। ग्रामीण क्षेत्र के बच्चे कम आ रहे हैं। पालकों में कोरोना का डर समाप्त किया जाए।
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