'परोल' हिमाचल प्रदेश से पारंपरिक प्रवेश द्वार: पगोडा, सतलुज और शिवालय शैली का किया गया प्रयोग - Web India Live

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'परोल' हिमाचल प्रदेश से पारंपरिक प्रवेश द्वार: पगोडा, सतलुज और शिवालय शैली का किया गया प्रयोग

भोपाल। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय की ऑनलाइन प्रदर्शनी शृंखला में मुक्ताकाश प्रदर्शनी से परोल: हिमाचल प्रदेश से पारंपरिक प्रवेश द्वार की जानकारी को ऑनलाइन एग्जीटि किया गया। संग्रहालय के निदेशक डॉ. प्रवीण कुमार मिश्र ने बताया कि हिमाचल की अपनी एक परम्परागत वास्तुकला रही है जिसे यहां के मंदिरों, महलों और घरों में देखा जा सकता है। इसी समृद्ध और विविधतापूर्ण वास्तुकला को संग्रहालय में दिखाने के लिए संग्रहालय के स्टाफ ने 2001-02 में चम्बा, किन्नोर, ऊना, लाहुल- स्पिति तथा शिमला जिलों का दौरा किया गया। पारम्परिक वास्तुकला को एक द्वार के रूप में निर्माण कर दिखाने का निर्णय लिया गया। संग्रहालय में इसे 2002 में द्वार क्रमांक-एक पर निर्मित किया गया है।

बारिश का भी नहीं असर
मिश्र ने बताया कि शिमला से देवदार की लकड़ी तथा धर्मशाला से कटे पत्थर, एक निश्चित माप में कटी स्लेटों एवं अन्य सामग्री का संकलन कर संग्रहालय लाया गया। इसके बाद वहां से कलाकार बुलाकर यहां गेट का निर्माण प्रारम्भ किया गया। सहायक क्यूरेटर डॉ. राकेश मोहन नयाल ने बताया कि पारम्परिक निर्माण शैली के अनुरूप लकड़ी और पत्थरों को एक समान दूरी पर जोड़ा गया। लकड़ी के स्लीपरों के ऊपर पत्थर फिर लकड़ी की चिनाई की गई। छत पर स्लेटों को कीलों के सहारे से इस प्रकार लगाया गया है कि वे तेज हवा या भारी वर्षा से भी खिसक न सके।

देवी-देवताओं की आकृतियां उकेरी गईं
गेट के सामने लोग प्रमुखत: बाबा बालकनाथ, हनुमान तथा अन्य देवी-देवताओं की आकृति बनाते हैं जिससे प्रवेश करते समय उन्हें नमन किया जा सके। हिमालय के मंदिरो में पगोडा, गुवंद, शिखर, शिवालय, सतलुज, पिरामिडिकल शैली के शिखर पाए जाते हैं। इस द्वार को बनाने के लिये कलाकारों द्वारा पगोडा, सतलुज और शिवालय शैली का मिश्रित प्रयोग किया गया है, जो कि हिमाचल के मंदिरों, महलों एवं पारम्परिक घरों की वास्तुकला को प्रदर्शित करता है। इस तरह के द्वारों को हिमाचल में अधिकांशत: परोल के नाम से जाना जाता है।



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