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लेखक की बात दर्शक समझ ले, तभी लेखक की भावनाएं होती हैं सार्थक

भोपाल। नाटक लिखना मुश्किल होता है। नाटक को लिखने वाला लेखक किस रूप में लिखता है और उस नाटक को डायरेक्टर किस प्रकार समझता है। अभिनय करने वाले पात्र किस प्रकार उस पर अभिनय करता है। जिसके बाद दर्शक कैसे नाटक को समझता है। यदि दर्शक की समझ में लेखक की बात आ जाती है तब लेखक की भावना सार्थक हो जाती है।

जो दर्शकों को हास्य के साथ समाज में व्याप्त कुरीतियों, समस्याओं और रूढि़वादिता पर संदेशात्मक विचार प्रकट करता है। उक्त विचार शनिवार को भोजपुर क्लब में सुमन ओबेराय द्वारा लिखित नाटक संग्रह ‘यह भी खूब रही’ के विमोचन अवसर पर कवि राजेश जोशी ने कही। उन्होंने कहा कि नाटक की भाषा बहुत ही स्पष्ट होना चाहिए, जो दर्शकों पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी डाले।

संग्रह में 4 नाटकों को शामिल किया

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए राजेश जोशी ने साहित्य प्रेमियों और नाट्य कला से जुड़े लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि नाटक संग्रह में 4 नाटकों को शामिल किया गया है, जिसमें सभी वर्ग के दर्शक अपना मनोरंजन करने के साथ ही संदेश भी प्राप्त करेंगे। उन्होंने बताया कि लेखिका सुमन ओबेराय आगरा यूनिवर्सिटी में मनोवैज्ञानिक की प्रोफेसर रही हैं।

उनके लेखन में मनोवैज्ञानिक का प्रभाव खासा रहता है। जिससे दर्शक उनकी भावना को आसानी से समझ जाते हैं। उन्होंने कहा कि इससे पूर्व भी सुमन ओबेराय की 2 पुस्तकों का विमोचन हो चुका है। जिनके नाटक देश ही नहीं विदेशों में भी धूम मचा रहे हैं। इस अवसर पर मुख्य अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार मुकेश वर्मा, विशेष अतिथि डॉ. स्वाति तिवारी, संचालन घनश्याम मैथिल ने किया।



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