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#महिला दिवस : राजनीति में मध्यप्रदेश की महिलाओं की भागीदारी की तस्वीर

भोपाल@अरुण तिवारी की रिपोर्ट...
महिलाओं ने बदलते वक्त के साथ राजनीति में भी अहम पदों पर रहकर नाम कमाया है। मध्यप्रदेश की महिला सांसदों ने अपनी अंतरराष्ट्रीय पहचान बनाई है, फिर भी दोनों प्रमुख सियासी दल भाजपा और कांग्रेस उनको टिकट देने में परहेज करते रहे हैं।

वर्ष 1957 से 2014 तक हुए लोकसभा चुनावों में प्रदेश से एक बार में अधिकतम छह महिला सांसद चुनी गईं। ये सभी 29 सीटों की 20 फीसदी भी नहीं हैं।

देश में महिला सशक्तिकरण की बात होती है, लेकिन लोकसभा और विधानसभा में उनको 33 फीसदी आरक्षण का विधेयक आज तक संसद में पास नहीं हो पाया है। हालांकि पंचायत से नगरीय निकाय तक 50 प्रतिशत आरक्षण है।

संसद में कब रहा सबसे ज्यादा महिला प्रतिनिधित्व
मध्यप्रदेश से 1957 से 2014 तक के चुनावों में 1962 और 2009 में अधिकतम छह महिला सांसद चुनी गईं। 1967, 1991 और 1996 में प्रदेश का महिला प्रतिनिधित्व पांच सांसदों का रहा।

 

प्रदेश के चर्चित महिला चेहरे

1- सुमित्रा महाजन
इंदौर से लगातार नौ बार की सांसद सुमित्रा महाजन वर्तमान में लोकसभा अध्यक्ष हैं। सुमित्रा भाजपा की पहली और लोकसभा की दूसरी महिला स्पीकर हैं। इससे पहले यूपीए सरकार में मीरा कुमार स्पीकर रह चुकी हैं।

2- सुषमा स्वराज
विदेश मंत्री सुषमा स्वराज विदिशा से सांसद हैं। वे विदिशा से लगातार दूसरी बार सांसद चुनी गई हैं। सुषमा को संसदीय जानकार, अच्छी वक्ता और विदेश मंत्री के रूप में जाना जाता है। वे लोकसभा नेता प्रतिपक्ष भी रही हैं।

3- उमा भारती
केंद्रीय मंत्री उमा भारती वर्तमान में उत्तर प्रदेश की झांसी से सांसद हैं, लेकिन इससे पहले वे मध्यप्रदेश के भोपाल और खजुराहो से सांसद रही हैं। उमा प्रदेश की पहली महिला मुख्यमंत्री भी रह चुकी हैं।

4- जमुना देवी
कांग्रेस की कद्दावर नेता रहीं जमुना देवी 1952 से 1957 तक लोकसभा सदस्य रहीं। वे प्रदेश की पहली महिला उपमुख्यमंत्री भी रहीं। उन्होंने विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष का दायित्व भी संभाला।

इस बार चुनाव में कितनी उम्मीद
2014 में पांच महिला सांसद चुनी गईं, ये सभी भाजपा की सांसद हैं। भाजपा ने पांच महिलाओं को ही टिकट दिए थे। कांग्रेस ने चार और बसपा ने एक महिला को टिकट दिया था, लेकिन सभी हार गईं। 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा महिला मोर्चा को सात से ज्यादा महिलाओं को टिकट की उम्मीद है। वहीं, महिला कांग्रेस को लगता है कि उनकी पार्टी 5-7 महिलाओं को टिकट देगी।

विद्यावती चतुर्वेदी
कांग्रेस नेता सत्यव्रत चतुर्वेदी की माता विद्यावती चतुर्वेदी सातवीं और आठवीं लोकसभा में प्रदेश से चुनी गईं। वे 1980 से 1989 तक सांसद रहीं। वे उस दौर की कद्दावर नेता मानी जाती थीं। उन्होंने संसद में कई मुद्दे उठाए थे।

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सीधी बात:
महिलाओं से जुड़े सवालों पर मांडवी चौहान प्रदेश अध्यक्ष, महिला कांग्रेस और भाजपा महिला मोर्चा की प्रदेश अध्यक्ष लता एलकर के सीधे जवाब...


प्रश्न :- राजनीति महिलाओं के लिए कितनी मुश्किल कितनी आसान है?

मांडवी: राजनीति में महिलाओं को मुश्किल तो आती है, लेकिन वे अपनी जगह बनाना जानती हैं। महिलाएं राजनीति में तेजी से आगे बढ़ रही हैं। समय के साथ महिला और पुरुषों की सोच भी बदलने लगी है। पढ़ी-लिखी युवतियां राजनीति को जनसेवा के साथ कॅरियर के रूप में भी देख रही हैं।

एलकर: ना तो बहुत मुश्किल है, ना ही आसान। हां, मैं इतना जरूर कहूंगी कि राजनीति के क्षेत्र में आने वाली महिलाओं को अपने क्षेत्र, प्रदेश और राष्ट्र के समसामयिक राजनीतिक-सामाजिक परिवेश का संपूर्ण ज्ञान होना चाहिए। रास्ता तो हर किसी का रोका जाता है, लेकिन यदि आपको पूरा ज्ञान है तो सब कुछ संभव है।

प्रश्न :- लोकसभा चुनाव में महिलाओं को कितनी टिकट मिलने की उम्मीद है?

मांडवी: कांग्रेस ने हमेशा महिलाओं को मौका दिया है। पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी महिलाओं को राजनीति में ज्यादा से ज्यादा प्रतिनिधित्व देने की मंशा के साथ काम कर रहे हैं। पिछली बार चार महिलाओं को टिकट मिला था। इस बार 5 से 7 महिलाओं को टिकट की उम्मीद है। अब महिलाएं चुनाव जीतने के लिए ही
लड़ती हैं।

एलकर: मुझे उम्मीद है पार्टी इस बार भी लोकसभा चुनाव में महिला उम्मीदवारों का ध्यान रखेगी। आप पिछले सालों के रिकॉर्ड उठाकर देख लीजिए, पुरुषों की तुलना में महिला प्रत्याशियों की जीत का प्रतिशत बहुत ज्यादा है। महिलाओं को चुनाव के ज्यादा टिकट देने से जीत की संभावनाएं भी ज्यादा बनेंगी।

प्रश्न :- महिला आरक्षण बिल लोकसभा में पास क्यों नहीं हो पाया?

मांडवी: कांग्रेस ने कोशिश की है कि लोकसभा-विधानसभा में महिलाओं को 33त्नआरक्षण मिले, लेकिन अन्य दल नहीं चाहते, इसलिए विधेयक पास नहीं हुआ। पुरुषों को लगता है कि महिला प्रतिनिधित्व बढ़ेगा तो उनका प्रभुत्व कम होगा। इस बार कांग्रेस के घोषणा पत्र में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण मुख्य मुद्दा है।

एलकर: पुरुष प्रधान व्यवस्था है। राजनीतिक दलों पर भी पुरुषों का वर्चस्व है, इसका खामियाजा महिलाओं को भुगतना पड़ रहा है। हमारी आशाएं तो इस बिल पर टिकी हुई हैं, लेकिन पुरुष चाहते ही नहीं कि महिलाओं को उनका हक मिले। अगर चाहते तो सभी मिलकर इस बिल को कब का पास कर चुके होते।



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