Women's Day: 1971 वॉर में 4 महीने बाद पता चली थी पापा के घायल होने की खबर,फिर भी आर्मी मैन से ही की शादी - Web India Live

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Women's Day: 1971 वॉर में 4 महीने बाद पता चली थी पापा के घायल होने की खबर,फिर भी आर्मी मैन से ही की शादी

भोपाल@विकास वर्मा, हितेश शर्मा की रिपोर्ट...
पुलवामा में हुए आतंकी हमले में हमारे जवान शहीद हुए, इससे पहले भी कश्मीर, उरी या देश के अन्य बॉर्डर पर आतंकी मुठभेड़ में जवान शहीद होते आए हैं। क्या कभी आपने सोचा है कि यह खबर सुनकर उन जवानों की फैमिली पर क्या बीतती है...

या ऐसे जवान जो वर्तमान में देश की सीमा पर तैनात हैं, या किसी युद्ध का हिस्सा रहे थे उनकी मां और वाइफ के दिलों में हर पल क्या चलता रहता है... इंटरनेशनल वुमंस डे के मौके पर पत्रिका प्लस आपको शहर के कुछ ऐसे ही आर्मी मैन की फैमिली की महिलाओं से रूबरू करा रहा है, जो बता रही हैं कि एक आर्मी मैन के परिवार का हिस्सा होना कैसा अनुभव होता है...

3 ईएमई सेंटर के कमाडेंट ब्रिगेडियर जीएस सभ्रवाल के पिता और दादाजी भी आर्मी में थे और उनकी वाइफ शबनम सभ्रवाल के पिता भी आर्मी में थे। वे बताती हैं कि मैंने बचपन से इस माहौल को देखा है।

आर्मी फैमिली का हिस्सा होना मेरे लिए हमेशा से गर्व की बात रही है। अब तो संचार के कई माध्यम हैं लेकिन पहले सिर्फ रेडियो ही एक माध्यम हुआ करता था। मेरे पापा 1962, 1965 और 1971 वॉर का हिस्सा रहे थे। 1971 में जब वे युद्ध के दौरान घायल हो गए थे तो हमें इसकी जानकारी 4 महीने बाद पता चली जब वो ठीक होकर वापस घर आए थे। इन सबके बावजूद भी मैंने आर्मी मैन से ही शादी करने का निर्णय लिया था।


कई जगहों पर ट्रांसफर के चलते हम पापा के साथ नहीं जा पाते थे क्योंकि वहां स्कूल नहीं होते थे और हमारी पढ़ाई बाधित न हो इसलिए पापा हमसे करीब 9 साल तक दूर रहे, इन 9 सालों में मां ने ही पिता की भूमिका निभाई। अपने पति के साथ डोकलाम का किस्सा शेयर करते हुए सभ्रवाल बताती हैं कि उस वक्त भारत-चीन बॉर्डर पर हालात बहुत खराब थे, हमेशा जेहन में लगा रहता था कि क्या होगा।

वहां जितने समय रहे यह भरोसा नहीं होता था कि शाम तक हम साथ रहेंगे या नहीं... लेकिन मन में एक विश्वास और हौसला था जो मैंने अपनी मां को देखकर सीखा था। वहीं आर्मी से किसी ऑपरेशन के सुबूत मांगने के मुद्दे का वे दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहती हैं, आर्मी का काम सुबूत देना नहीं होता है।

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ऑफिसर का फोन आया तो कहा- जो खबर देनी है दीजिए, मैं सब सुनने के लिए तैयार हूं :
कीर्ति चक्र से नवाजे गए कैप्टन देवाशीष की मां निर्मला शर्मा वर्तमान में सिरेमिक आर्टिस्ट हैं। निर्मला बताती है कि आर्मी के परिवार के सदस्य के लिए यह बहुत ही अनएक्सपेक्टेेड होता है कि अगले पल क्या हो जाएगा।

पेरेंट्स को पता तक नहीं होता कि उनका बच्चा कहां पोस्टेड है। ऐसे में अगर कोई भी खबर आती है तो लगता है कि इसमें मेरा बेटा तो नहीं। कभी घर पर चि_ी भी आती थी तो खोलने से पहले भी डर लगता था।

1994 में जब बेटा शहीद हुआ तो मेरे पास फोन आया, आर्मी ऑफिसर्स ने पूछा कि आपके घर में कोई और नहीं है क्या? मैंने कहा घर पर मैं ही हूं, पति बाहर हैं आपको जो खबर देनी है दीजिए, मैं सब सुनने के लिए तैयार हूं।

मुझे उस दिन सुबह से ही लग रहा था कि कुछ अहित होने वाला है, बेटे या पति के बारे में यह नहीं पता है। आर्मी ऑफिसर्स ने बताया कि बेटे को गोली लगी और वो शहीद हो गए हैं।

जब खबर सुनी तो बहुत धक्का लगा लेकिन कुछ महीनों बाद यह अहसास होता है कि बेटा देश के लिए शहीद हुआ। कैप्टन देवाशीष शर्मा भारतीय सेना में डॉक्टर थे। करगिल से पहले ऑपरेशन रक्षक के दौरान 10 दिसम्बर 1994 को जब कैप्टन जवानों का अस्पताल पहुंचा रहे थे, इस दौरान जम्मू के कुपवाड़ा में हुए एक हमले में वे शहीद हो गए।

मैं जानती हूं...
मैं जानती हूं आज के बाद का सच
ये भीड़, ये भावना, ये साथ
आज के शोर के बाद का सन्नाटा जानती हूं मैं
तुम सब नहीं आओगे दोबारा जानती हूं मैं

हफ्ते की छुट्टियों में आनेवाला और
साल भर का काम करके जाने वाला चला गया है
सारे बादल, सारी धूपें, सारे बरस
ये जि़न्दगी मुझपे बरसेगी

राशन वाला अब संकोच करना शुरू कर देगा
और घर मुश्किलों से चलेगा
समय कुछ ऐसे बदलेगा कि
छोटी अब जल्दी बड़ी हो जाएगी
और उसके बाबा अब बूढ़े नहीं होंगे

इसलिए कमजोर भीड़ में भरे हुए लोगों
अभी तो तुम स्वयं को मजबूत करो
क्योंकि, तुम जिसे उठाकर ले जाओगे
वो अकेला विदा नहीं होगा
एक बचपन, एक ममता, एक सिन्दूर
एक लाठी, हठ, उत्सव, कुछ गहने जाएंगे
कई सपने जाएंगे, कई अपने जाएंगे,
उसके साथ एक अधूरा सफर भी जाएगा
उसके साथ उसका घर भी जाएगा

मैं यह सब जानती हूं क्योंकि,
पिछली लड़ाई में अपने ही गांव का
जो जवान शहीद हुआ था
उसकी मां जिंदगी से कैसे रोज-रोज लड़ती है
उसकी बेटी कैसे मुश्किलों से पढ़ती है
उसकी बीबी किस तरह से जीती है
मैं जानती हूं...
- डॉ. सुधीर आज़ाद

पाकिस्तान ने उन्हें बंधक बना लिया, यह खबर 9 दिन बाद रेडियो से मिली:
रिटायर्ड एयर वाइस मार्शल आदित्य विक्रम पेठिया(वीर चक्र) की पत्नी गीता पेठिया बताती हैं कि वैसे तो हमारी शादी 1973 में हुई थी। भारत-पाकिस्तान के बीच 1971 में हुए वॉर के पहले हमारी शादी तय हो चुकी थी।

पाकिस्तान ने उन्हें वॉर प्रिजनर बना लिया। इस दौरान उन्हें बहुत प्रताडऩा दी गई। उनके बंधक बनाए जाने के नौ दिन बाद रेडियो पर मुझे सूचना मिली। मुझे चिंता तो थी लेकिन हमेशा उम्मीद थी कि वे लौटकर आएंगे। एक पायलट की वाइफ होने के कारण दिल में हमेशा डर तो रहता था कि पता नहीं अगले पल क्या होगा।

जब भी किसी विमान के क्रैश होने की सूचना मिलती तो मैं उनसे संपर्क करने की कोशिश करती। हालांकि मैं अपनी टेंशन कभी इन्हें नहीं बताती थी। एक ऑफिसर की पत्नी की अपनी जिम्मेदारियां होती है। मेरे तीन भाई और बेटा आनंद विक्रम भी एयरफोर्स में हैं।

women's special Day

करगिल वॉर में थे पति इसलिए 20 दिन बाद हो पाई थी उनसे बात:
रिटायर्ड ब्रिगेडियर आर विनायक(वीएसएम) की पत्नी जयलक्ष्मी आर विनायक बताती हैं कि वर्ष 1999 में हम उधमपुर में थे, मुझे पता चला कि पति को करगिल वॉर में भेजा गया है। मेरी उनसे किसी तरह से बात नहीं हो पा रही थी।

जब उनके मूवमेंट के बारे में पता नहीं चला तो मैं उनके ऑफिसर के घर पहुंची। उन्होंने बताया कि ऑफिसर को मिशन पर वहां भेजा गया है। वह सुरक्षित नीचे उतर आए हैं। 20 दिन बाद मेरी उनसे बात हो पाई। कमांडिंग ऑफसर की वाइफ होने के कारण मुझे खुद के साथ सारे फौजियों के परिवार को भी संभालना होता था।

मैं कोशिश करती थी कि उनके परिवार की परेशानियों को अपने स्तर पर हल कर सकूं। हमारी शादी 1993 में हुई, आर्मी से फैमिली बैकग्राउंड होने के कारण सेना के ऑफिसर का रूटीन मेरे लिए नया नहीं था।



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