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भारतीय पाठक सर्वेक्षण के नतीजे घोषित, पत्रिका फिर बना सिरमौर

(तीनों राज्यों की सम्मिलित औसत दैनिक पाठक संख्या बढ़कर हुई 1 करोड़ 14 लाख 13 हजार, निष्पक्ष पत्रकारिता, विश्वसनीय खबरों और दमदार कवरेज से पाठकों के दिलों पर राज कायम)


मुंबई। राजस्थान पत्रिका और पत्रिका समाचार पत्र ने मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान की सम्मिलित औसत पाठक संख्या में एक बार फिर बढ़त बनाई है। भारतीय पाठक सर्वेक्षण (आइआरएस)- 2019 (प्रथम तिमाही) के ताजा आंकड़ों में पत्रिका समूह ने फिर यह मुकाम हासिल किया है।
आइआरएस के अनुसार तीनों राज्यों की सम्मिलित औसत दैनिक पाठक संख्या बढ़कर 1 करोड़ 14 लाख 13 हजार हो गई है। यह प्रतिस्पर्धी समाचार पत्र की औसत दैनिक पाठक संख्या से अधिक है। अपनी यह सफलता हम अपने पाठकों को समर्पित करते हैं क्योंकि उनके अटूट भरोसे से ही पत्रिका की यह धाक बरकरार है।

 

पत्रिका ने मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ के साथ राजस्थान में भी अपनी विश्वसनीय खबरों और दमदार कवरेज से पाठकों में पैठ बनाई है। व्यापक जनहित के अभियान और जन सरोकारों से जुड़ी पत्रकारिता को लेकर पत्रिका की अलग पहचान है। पत्रिका की खबरों पर शासन-प्रशासन तत्काल प्रभावी कार्रवाई करता है। आंकड़े साबित करते हैं कि पाठक सनसनीखेज और अवसरवादी पत्रकारिता को नकार कर पत्रिका की मूल्य आधारित और सकारात्मक पत्रकारिता के साथ खड़े हैं।

 

बदलाव के नायक बन विधानसभा पहुंचे 30 चेंजमैकर

विधानसभा चुनाव के महाकवरेज और चेंजमैकर अभियान से राजस्थान पत्रिका पाठकों के दिलों का सरताज बन गया है। चुनावों के दौरान पत्रिका ने स्वच्छ राजनीति के लिए राज्य के चप्पे—चप्पे पर जागो जनमत और चेंजमैकर अभियान चलाया। इसके सकारात्मक परिणाम सामने आए। स्वच्छ छवि के कई सामाजिक कार्यकर्ताओं को पत्रिका के जरिये आगे बढऩे का मौका मिला। हमारे चेंजमैकर अभियान से ही जुडकर 30 आम आदमी बदलाव के नायक बने और राजस्थान व मध्यप्रदेश विधानसभा में चुनकर पहुंचे। लोकसभा चुनाव—2019 के दौरान भी पत्रिका का यह अभियान जारी है।

 

काला कानून के खिलाफ दमदार महाभियान
अपनी धारदार और निष्पक्ष पत्रकारिता के रूप में राजस्थान पत्रिका की धाक जनमानस के बीच और बढी है। राजस्थान में सरकार जिस तरह से भ्रष्ट राजनेताओं व नौकरशाहों को बचाने के लिए काला कानून लेकर आई उसके खिलाफ भी पत्रिका के रुख को पाठकों ने अपार समर्थन दिया है। इसके लिए पत्रिका ने न तो विज्ञापनों की परवाह की और न ही अन्य प्रलोभनों की। इसी के परिणामस्वरूप राजस्थान में पत्रिका के आसपास कोसों तक कोई प्रतिस्पर्धी नहीं है।



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