Chaitra Navratri 2021 : ये है सबसे पुराना शिला-शक्तिपीठ, जहां चट्टान पर दिखता है देवी मां का मुख - Web India Live

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Chaitra Navratri 2021 : ये है सबसे पुराना शिला-शक्तिपीठ, जहां चट्टान पर दिखता है देवी मां का मुख

चैत्र नवरात्रि 2021 का प्रारंभ 13 मार्च यानि मंगलवार से हो चुका है। ऐसे में इन दिनों हर हिंदू देवी मां की भक्ति में संलग्न रहता है। दरअसल देवी दुर्गा ( Goddess Durga ) को सनातन धर्म में शक्ति की देवी माना गया है। चैत्र मास में नवरात्र के नौ दिन, नौ देवियों की महिमा का गुणगान किया जाता है।

साथ ही देवी मां से आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए कई तरह के आयोजन भी होते हैं। ऐसे में आज हम आपको देवी मां ( Goddess Temple ) के एक ऐसे मंदिर के बारे में बता रहे हैं। जो अत्यंत प्राचीन होने के साथ ही इसका सीधा नाता माता सती से माना गया है।

दरअसल शाक्त परम्परा की महाशक्तियों के पूजन की प्रथा देवभूमि उत्तराखण्ड में बहुत पुरानी है। यहां सबसे बड़ा धार्मिक प्रभाव भगवान शिव ( lord shiv ) और उनकी अर्द्धांगिनी पार्वती का रहा है। पार्वती के ही विभिन्न रूपों को इन महाशक्तियों की तरह पूजा जाता रहा है। इन महाशक्तियों को दुर्गा, काली, चामुंडा, कालिका, महाकाली जैसे अनेक नामों से संबोधित और पूजित किया जाता रहा है।

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ऐसे में यहां महाशक्ति के पूजन की परम्परा में जो अनगिनत देवालय बनाए गए हैं उन्हें मोटे तौर पर दो वर्गों में बांटा जा सकता है। पहले वर्ग में वे मंदिर आते हैं जिनमें शक्तिस्वरूपा देवी मां की मूर्तियां स्थापित हैं।

ऐसे मंदिरों में मुख्यतः दुर्गा, महिषासुरमर्दिनी, महिषमर्दिनी, हर-गौरी और चामुंडा आदि की प्रतिमाएं प्रतिष्ठित हैं। जबकि दूसरे वर्ग में ऐसे देवालय आते हैं जिनमें देवी को किसी शिला या उसके विग्रह के रूप में पूजा जाता है। इन देवस्थानों में कसारदेवी, पुण्यागिरी ( Purnagiri-Mandir ), जाखनदेवी, विन्ध्यवासिनी समेत अनेक स्थान मौजूद हैं।

पौराणिक मान्यता के अनुसार दक्ष प्रजापति अपनी पुत्री सती का विवाह शिव से नहीं करना चाहते थे, लेकिन दैवीय आग्रह के चलते उन्हें ऐसा करना पड़ा। विवाह के कुछ समय बाद जब दक्ष प्रजापति ने अपने घर में हो रहे एक यज्ञ में सभी देवताओं को तो बुलाया, लेकिन शिव ( Shiv-Parvati ) को नहीं बुलाया तो इसे अपने पति का अपमान जान कर पार्वती आहत हो गईं।

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दुखी पार्वती ने यज्ञ के हवनकुंड में यह कहते हुए कूद गई कि वे अगले जन्म में भी शिव को ही अपना जीवनसखा चुनेंगी। जब महादेव को इस घटना का पता चला वे अत्यंत क्रोधित हुए और उन्हीने उन्होंने अपने गणों की सेना की मदद से दक्ष प्रजापति के यज्ञस्थल ( VeerBhadra ) को तहस-नहस कर डाला।

दक्ष प्रजापति में सती हो गयी अपनी अर्धांगिनी के दग्ध शरीर को देख शिव वैरागी हो गए और पार्वती के शरीर को लेकर अंतरिक्ष में इधर-उधर भ्रमण करने लगे।

माना जाता है कि पार्वती की देह से अलग होकर उनके अंग जहां-जहां गिरे वहां शक्तिपीठें ( Shakti Peeth ) स्थापित हो गईं। माता पार्वती के नयन नैनीताल में गिरे और उनसे निकली आंसुओं की धारा से सरोवर का जन्म हुआ।

झील के लगभग बीचोबीच के बिंदु के समीप दाईं तरफ सड़क से लगी पहाड़ी पर एक और महत्वपूर्ण देवी मंदिर है जिसे पाषाण देवी का मंदिर कहा जाता है।

अंतरिक्ष में भ्रमणरत शिव के कंधे पर पड़ी माता पार्वती की जली हुई देह से गिरे नेत्रों से नैनीताल सरोवर बना। मान्यता के अनुसार अयारपाटा की पहाड़ी के दक्षिण-पूर्वी तल पर उस देह से ह्रदय और अन्य हिस्से (अर्थात पाषाण) गिरे। उसी स्थान पर पाषाणदेवी का मंदिर स्थापित है।

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पाषाणदेवी के इस मंदिर में देवी की पूजा शिला में उभरी एक आकृति के रूप में की जाती है। आकार में विशाल इस शिला में देवी दुर्गा के नौ स्वरूपों ( Nine Goddess ) का दर्शन होता है। यह एक अद्वितीय चट्टान है, माना जाता है कि इस चट्टान पर मां का मुख दिखाई देता है, जबकि उनके पैर नीचे झील में डूबे हुए हैं। इस मंदिर में हर शनिवार, मंगलवार और नवरात्रि में देवी मां को चोला चढ़ाया जाता है।

इस मंदिर के परिसर में हनुमान ( Hanuman ji ) की प्रतिमा के अलावा एक शिवलिंग भी है। नवदुर्गा का रूप मानी जाने वाली चट्टान को देवी के मुख का रूप देकर सुसज्जित किया गया है। यहां आने वाले श्रद्धालु देवी को सिन्दूर अर्पित करते हैं और सिन्दूर ही से देवी की प्रतिमा का श्रृंगार किया जाता है।

लोकमान्यता के अलावा पौराणिक और ऐतिहासिक साक्ष्यों की मानें तो नैनीताल का पाषाण देवी मंदिर देवभूमि उत्तराखण्ड के सबसे पुराने शिला-शक्तिपीठों में से एक है। पूर्व में इस मंदिर में आसपास के गांवों के पशुचारक लोग दूध और मट्ठा चढ़ाया करते थे।

ग्रामीणों में पाषाण देवी का आज भी वही स्वरुप पूज्यनीय माना जाता है। मान्यता है कि पाषाण देवी के मुख को स्पर्श किये हुए जल को लगाने से त्वचा रोगों से तो मुक्ति मिलने के साथ ही प्रेतात्माओं के पाश से निकलने की राह भी खुलती है।

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इस नव दुर्गा ( Nav Durga ) रूपी शिला के नीचे एक गुफा की बात भी कही जाती है, जिसके भीतर नागों का वास माना जाता है। हर वर्ष नवरात्रि के पावन पर्व में यहां भक्तों का तांता लगा रहता है। जबकि नवरात्रि के नवें दिन इस मंदिर का महत्व और भी बढ़ जाता है, क्योंकि इस दिन मंदिर में मां भगवती के सभी 9 स्वरूपों के दर्शन एक साथ होते हैं।

मां के नौ रूपों के दर्शन के लिए भक्त दूर-दूर से आते हैं। इस दौरान भगवती पूजन, हवन यज्ञ, कन्या पूजन, सुन्दर कांड का पाठ, गणेश पूजन, पंचांगी कर्म, श्री रामचंद्र ( Ramraksha shotra ) परिवार का पूजन और अखंड रामायण पाठ जैसे अनुष्ठान होते हैं।

मंदिर के पूजारी के अनुसार मंदिर की स्थापना के समय से ही यहां एक अखंड ज्योति प्रज्जवलित है। पुजारी द्वारा हर रोज यहां सुन्दरकाण्ड और दुर्गा सप्तशती का पाठ किया जाता है। इसके अलावा श्रावण और माघ के महीनों में नियमित पाठ के अतिरिक्त रुद्राभिषेक भी किया जाता है। देवी को चढ़ाए जाने वाले श्रृंगार को उनके वस्त्रों की मान्यता है।

बताया जाता है कि माता दुर्गा को चढ़ाए जाने वाले अभिमंत्रित जल को प्रत्येक दस दिन में एक बार निकाला जाता है और उसे हकलाहट और अन्य ऐसी ही व्याधियों के रोगियों को औषधि के रूप में दिया जाता है।

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