देश में हर दिन 65 हजार लोग आत्महत्या करने के बारे में सोचते हैं, 5 हजार लोग प्रयास करते हैं
भोपाल। विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस के अवसर पर पब्लिक रिलेशन सोसायटी ऑफ इंडिया, भोपाल चेप्टर की ओर से जनसंपर्क विभाग और निओ-विजन सोसायटी के सहयोग से आत्महत्या की घटनाओं की रिपोर्टिंग विषय पर ऑनलाइन कार्यशाला का आयोजन किया गया। प्रमुख वक्ता के रूप में पीआरएसआइ भोपाल चेप्टर के अध्यक्ष पुष्पेन्द्र पाल सिंह, मनोचिकित्सक डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी शामिल हुए।
डॉ. त्रिवेदी ने कहा कि अध्ययनों के आधार पर यह तथ्य सामने आते हैं कि हर दिन लगभग 65 हजार लोगों के मन में आत्महत्या का विचार आता है और लगभग 5 हजार लोग इसके लिए प्रयास करते हैं। यह समस्या बढती जा रही है। आत्महत्या आर्थिक, सामाजिक और व्यक्तिगत कारणों की समन्वित परिणति होती है। उन्होंने वर्थर प्रभाव का उल्लेख करते हुए बताया कि द सारोज ऑफ यंग वर्थर नामक उपन्यास में प्रेम में असफल वर्थर ने आत्महत्या की। इस उपन्यास की सफलता से तत्कालीन समाज में आत्महत्या का प्रतिशत बढ़ गया था। आत्महत्या का महिमामंडन इस प्रवृत्ति को बढ़ावा देता है। एक आत्महत्या से लगभग 200 लोग प्रभावित होते हैं। अमेरिका में आत्महत्या की मीडिया रिपोर्टिंग की गाइडलाइन आने के बाद आत्महत्या के प्रकरण कम हुए।
आत्महत्या का महिमामंडन सही नहीं
वहीं, गिरजा शंकर ने कहा कि आत्महत्या का महिमामंडन सही नहीं, लेकिन किसान आत्महत्या के मामले चिंता का विषय हैं। दयाशंकर मिश्र ने कहा कि सिनेमा, सीरियल, वेब सीरीज और इन्टरनेट पर उपलब्ध सामग्री का व्यापक असर लोगों पर पड़ता है। ऐसे में मीडिया समाज के लिए सकारात्मकता का दूत बन कर अपनी भूमिका निभा सकता है। पुष्पेंद्र पाल सिंह ने कहा कि समाचार लिखते या दिखाते समय ध्यान रहे कि कहीं आत्महत्या की खबरें महिमामंडित ना हों। ऐसी प्रवृत्तियों को ग्लैमराइज करने से बचना होगा, वर्ना अन्य लोगों पर इसका गहरा असर हो सकता है। इसके लिए भाषा शैली का विशेष ध्यान रखें और आत्महत्या की प्रक्रिया स्पष्ट ना करें और सुसाइड नोट की भाषा ना लिखें।
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