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40 फोटो से दिखाई आजाद की जीवन कथा

भोपाल। स्वराज संस्थान संचालनालय द्वारा अमर शहीद चन्द्रशेखर आजाद की पुण्य तिथि पर स्वराज भवन की वीथी में आजाद कथा चित्र प्रदर्शनी का आयोजन किया जा रहा है।

प्रख्यात चित्रकार लक्ष्मण भांड द्वारा बनाए गए चित्रों को रंजना चितले द्वारा अपने शब्दों में ढालकर आजाद की साहसिकता और निर्भयता को प्रस्तुत किया गया है। भारतीय स्वाधीनता संग्राम के अप्रतिम नायकों में अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद देश की वीरता और बलिदान के प्रतीक हैं।

देश की आजादी के लिए किए गए संघर्ष, साइमन कमीशन के विरोध में साण्डर्स वध, ब्रिटिश सरकार द्वारा बनाये गए काले कानून के विरोध में बम विस्फोट और अनेक क्रांतिकारी आंदोलन की घटनाओं और उनके जीवन कृतित्व को दर्शाती 40 से अधिक चित्र एग्जीबिट किए गए हैं।

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आजाद ही रहे हैं, आजाद ही रहेंगे

27 फरवरी 1931 को आजाद ने साथी सुखदेव राज को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में बर्मी जाने की योजना बनाने के लिए बुलाया। साथी वीरन्द्र तिवारी ने पुलिस को सूचना दे दी। पुलिस ने उन्हें चारों तरफ से घेर लिया। आजाद ने जामुन के पेड़ की आड़ लेकर अकेले हथियार बंद सिपाहियों का डटकर मुकाबला किया और दुश्मनों के छक्के छुड़ा दिए। जब माऊजर में एक गोली बची तो अपने कनपटी पर दाग माृतभूमि पर कुर्बान हो गए। दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे, आजाद ही रहे हैं, आजाद ही रहेंगे। अपने इस प्रण पर आजाद क्रांतिकारी जीवन का आदर्श बन अमर हुए।
फोटो में जलियांवाला बाग हत्याकांड

इन पेंटिंग्स में चंद्रशेखर के शौर्य को दिखाया, जिसमें अंग्रेजों से लोहा लेते आजाद अल्फ्रेड पार्क पहुंचते हैं, जहां उन्होंने स्वयं गोली मारी थी और हमेशा आजाद रहे। एक अन्य चित्र में 13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग में हुए हत्याकांड को भी दिखाया है। इसमें बताया कि रोलेट एक्ट का विरोध करती सभा में लोगों पर जनरल डायर के निर्देश पर अंधाधुंध गोलीबारी हुई, जिसमें सैकड़ों लोंगों की जान गई थी।

 

भगतसिंह ने बनाई हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातांत्रिक सेना
27 फरवरी 1931 को आजाद ने शुभ देवराज को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में बुलाया। गद्दार साथी की सूचना पुर पुलिस ने उन्हें घेर लिया। आजाद ने पेड़ की आड़ में डटकर मुकाबला किया। जब माउजर में एक गोली बची तो अपनी कनपटी पर दाग मातृभूमि पर कुर्बान हो गए। वहीं एक अन्य फोटो में 9 सितंबर 1928 को दिल्ली में क्रांतिकारी दल की बैठक हुई, बैठक में भगत सिंह, सुखदेव, विजय कुमार, मनोहर बनर्जी आदि उपस्थित थे। अध्यक्षता आजाद ने की थी, पर वह नहीं पहुंच सके। इस बैठक को भगत सिंह ने संचालित किया और दल का नाम हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातांत्रिक सेना रखा गया।



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