क्या आप जानते हैं पार्टियों का ये खास समीकरण? कैसे हारे नेता भी दल बदलते ही बन गए जिताउ...
भोपाल@अरुण तिवारी की रिपोर्ट...
राजनीति में कब कहां क्या हो जाए कुछ कहा नहीं जा सकता। यहां कब किसकी चाल किस पर भारी पड़ेगी या किसकी चाल उसकी ही नईयां डूबो देगी इसे बड़े से बड़ा सियासी पंडित भी गारंटी के साथ नहीं कह सकता।
ऐसा ही कुछ मध्यप्रदेश में भी हुआ है, जहां एक ओर भाजपा और कांग्रेस दोनों ही अपने पूरे पत्ते अब तक नहीं खोल पाए हैं। वहीं दोनों पार्टियों को इन दिनों एक दूसरे के हारे (व जिन्हें पहली पार्टी ने ही माना था कमजोर) प्रत्याशी बहुत भा रहे है। और भा ही नहीं रहे बल्कि पार्टियां उनको लोकसभा के टिकट देकर तक खुश करने में जुटी हुई दिख रही हैं।
भाजपा: अजब है इनका गणित...
जानकारों की मानें तो भाजपा में राजनीति का गणित इतना अजब है कि उसे समझ पाना हर किसी के बस की बात नहीं दिखती। तभी तो कल तक जो व्यक्ति अपनी तत्कालीन जगह को छोड़कर सांसद नहीं बनना चाहता था, उसे पहले पार्टी ने सांसद बनवा दिया, अब वहीं व्यक्ति जब एक बार फिर से सांसद बनना चाहता है तो पार्टी ने उसका टिकट ही काट दिया।
वो भी दूसरी पार्टी से आए उस हारे हुए उम्मीदवार के लिए जिसे उनके इसी उम्मीदवार ने हराया था, जो पहले सांसद नहीं बनना चाहता था।
जानकारों की मानें तो चंद महीनों में ही प्रदेश की सियासत का मिजाज बदल गया है। ऐसे में सियासत सिर्फ जीत ही देखना चाहती है। यहां तक की पैराशूटी उम्मीदवारों से तौबा करने वाले राजनीतिक दल चुनाव के दौरान नियम-कायदों को भी ताक पर रख देते हैं।
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जी हां,हम बात कर रहे हैं शहडोल की। जहां से भाजपा ने मौजूदा सांसद ज्ञान सिंह का टिकट काट दिया गया है और ये टिकट कोई ऐसे बड़े दिग्गज के लिए भी नहीं काटा गया, बल्कि एक ऐसे उम्मीदवार के लिए काटा गया जिनको पार्टी में आए जुम्मा-जुम्मा आठ रोज भी नहीं हुए। आलाकमान से आए आदेश के बाद अब भाजपा की ओर से अब हिमांद्री शहडोल से चुनाव लड़ेंगी।
कभी ज्ञान सिंह ने ही हराया था इन्हें...
इसमें भी सबसे खास बात तो ये है कि कभी कांग्रेस की उम्मीदवार रहीं हिमांद्री को ज्ञान सिंह ने ही शहडोल सीट पर उपचुनाव में ढाई साल पहले पचास हजार से ज्यादा मतों से हराया था।
इसके बावजूद भाजपा ने ज्ञान सिंह को किनारे कर हिमाद्री को शहडोल से अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया।
दरअसल ढाई साल पहले जब शहडोल लोकसभा सीट पर उपचुनाव की बारी आई तो तत्कालीन सत्ताधारी दल भाजपा के लिए ये प्रतिष्ठा का सवाल बन गया। भाजपा को ज्ञान सिंह में जिताउ उम्मीदवार नजर आया। न न करते हुए मंत्री रहे ज्ञान सिंह को चुनाव लड़ाया गया।
ज्ञान सिंह मंत्री पद छोड़कर सांसद नहीं बनना चाहते थे,लिहाजा वे अपनी उम्मीदवारी से रुठ कर घर बैठ गए। जब सांसद नहीं बनना चाहते थे तो उन्हें पार्टी ने सांसद बना दिया,अब वे सांसद बनना चाहते हैं तो उनका टिकट काट दिया।
कांग्रेस भी पीछे नहीं...
ऐसा नहीं है कि केवल भाजपा की ओर से ही ये खास का राजनैतिक तरीका अपनाया गया हो, यानि इस नए व अजब तरह के तरीके पर कार्य करने में कांग्रेस भी पीछे नहीं दिख रही है। 2018 में भाजपा की ओर से हार के डर के चलते विधानसभा में टिकट कटने के बाद कांग्रेस में आईं प्रमिला सिंह को शहडोल की उम्मीदवारी का तोहफा दे दिया।
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यानि कुल मिलाकर दोनों ही पार्टियों ने दूसरी पार्टी से आई कमजोर मानी गई प्रत्याशियों पर दांव लगाया है।
शहडोल उपचुनाव : क्या आप जानते हैं ये सच!...
शहडोल लोकसभा सीट पर ढाई साल पहले जब उपचुनाव की बारी आई तो भाजपा के लिए ये प्रतिष्ठा का सवाल बन गया। ऐसे में भाजपा को ज्ञान सिंह में एक जिताउ उम्मीदवार नजर आया।
ऐसे में न न करते हुए मंत्री रहे ज्ञान सिंह को चुनाव लड़ाया गया। ज्ञान सिंह मंत्री पद छोड़कर सांसद नहीं बनना चाहते थे, लिहाजा वे अपनी उम्मीदवारी से रुठ कर घर पर ही बैठ गए।
वहीं कांग्रेस ने दलवीर सिंह की बेटी हिमाद्री को टिकट दिया। हिमाद्री के पिता और माता इस सीट से सांसद रह चुके हैं। तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान समेत उनके मंत्रिमंडल ने शहडोल में ही डेरा डाल लिया। तब जाकर ज्ञान सिंह पचास हजार से चुनाव जीत पाए। जबकि इसके पहले ये अंतर ढाई लाख से ज्यादा था।
इसी चुनाव में प्रचार के दौरान ज्ञान सिंह ने हिमाद्री को लेकर कहा था कि दिल को देखो,चेहरा न देखो, दिल सच्चा और चेहरा झूठा। उनका ये बयान बहुत चर्चा में रहा और हिमाद्री ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि ज्ञान सिंह को अपनी उम्र देखनी चाहिए। ढाई साल बाद वक्त का पहिया 360 डिग्री घूम गया।
हिमाद्री उसी सीट से फिर उम्मीदवार बन गईं, लेकिन इस बार चुनाव चिन्ह हाथ के पंजे की जगह कमल का फूल हो गया।
कोई कुर्बान: तो किसी को लगा तगड़ा झटका...
वहीं बेरहम सियासत की तलवार ने हिमाद्री के लिए ज्ञान सिंह को कुर्बान कर दिया। कांग्रेस की कमजोर कैंडिडेट भाजपा के लिए जिताउ बन गई। कांग्रेस भी हिमाद्री को टिकट देना चाहती थी, लेकिन उसने एक शर्त रख दी कि पति नरेंद्र मरावी को कांग्रेस में शामिल कराना होगा।
कांग्रेस प्रत्याशी विहिन!...
हिमाद्री को ये शर्त मंजूर नहीं थी और उन्होंने पति को कांग्रेस में लाने की जगह खुद ही भाजपा की राह चलना बेहतर समझा। जिसका कांग्रेस को तगड़ा झटका भी लगा। चर्चा यहां तक थी कि इस दौरान कांग्रेस यहां कुछ दिनों के लिए प्रत्याशी विहिन जैसी हो गई।
भाजपा की चाल पर कांग्रेस की दांव...
एक ओर जहां भाजपा कांग्रेस के प्रत्याशी को अपनी ओर कर कांग्रेस को करारी चोट दे रही थी। वहीं कांग्रेस ने भी भाजपा की काट के लिए पुराने भाजपाई को ही आगे बढ़ा दिया।
दरअसल 2013 में प्रमिला सिंह जयसिंह नगर से भाजपा की टिकट पर विधायक चुनी गईं। 2018 का चुनाव आया तो भाजपा ने प्रमिला का टिकट काटकर जयसिंह मरावी को दे दिया। कांग्रेस के हाथ बढ़ाते ही प्रमिला ने उसे तुरंत थाम लिया।
सियायत का दूसरा रंग...
एक ओर जहां भाजपा ने जिसे विधानसभा चुनाव जीतने लायक तक नहीं समझकर टिकट काट दिया, वहीं वो कांग्रेस के सर्वे में जिताउ उम्मीदवार बनकर सामने आई।
राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि सियासी लोगों के पास आखिर ऐसा कौन सा चश्मा है जिसमें दूसरे दल का हारा हुआ उम्मीदवार उन्हें अपने दल में जिताउ नजर आता है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने पैराशूट उम्मीदवारों से परहेज बरतने की बात कही थी लेकिन उस पर अमल विधानसभा चुनाव में भी नहीं हुआ और लोकसभा चुनाव में भी नहीं हो रहा। पहली सूची में एक पैराशूट है आगे इस तरह के कुछ और उम्मीदवार नजर आ सकते हैं।
अब पार्टी ने जो कर दिया सो ठीक है,उसमें क्या किया जा सकता है,सब माताजी की लीला है।
- ज्ञान सिंह,सांसद,शहडोल
जीत निश्चित, अधूरे काम दोबारा पूरे करने का मौका मिलेगा,हमेशा से कार्यकर्ता से लेकर पदाधिकारी और जनता का सहयोग मिला है। इस चुनाव में भी जनता पुराने बेहतर कार्य और विकास को लेकर आकंलन करेगी।
- प्रमिला सिंह,कांग्रेस उम्मीदवार,शहडोल
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