नर्मदा को बचाना है तो सहायक नदियों को रखना होगा जीवित - Web India Live

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नर्मदा को बचाना है तो सहायक नदियों को रखना होगा जीवित

भोपाल। सप्रे संग्रहालय में शनिवार को नदी संहिता पर विमर्श कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इसमें भूजल विज्ञानी कृष्ण गोपाल व्यास ने नदी संहिता पर चर्चा की। व्यास देश के पहले जल विज्ञानी हैं, जिन्होंने नदियों को जिंदा रखने के लिए नदी संहिता विकसित की है।

उन्होंने कहा कि नदी संहिता में बताए मार्ग पर चलकर नदियों को सूखने से बचाया जा सकता है। उनके प्रवाह को अविरल बनाया जा सकता है। इसके लिए प्रयासों की शुरुआत मुख्य नदियों की सहायक नदियों से करनी होगी। जैसे नर्मदा के प्रवाह को बढ़ाना है तो उसके कछार की सभी सहायक नदियों के कैचमेंट में बड़े पैमाने पर भूजल रीचार्ज का काम करना होगा। इसके लिए बड़ी संख्या में बारहमासी ज्यादा से ज्यादा गहरे तालाब बनाने होंगे। नदी के उपयोग में किफायत बरतनी होगी।

खनन भी प्रवाह को हानि पहुंचाता है

नदी की रेत का अमर्यादित खनन भी उसके प्रवाह को हानि पहुंचाता है। उसे रोकने के लिए खनन प्रक्रिया को वैज्ञानिक आधार देना होगा। नदियों में मिलने वाले गंदे पानी को पूरी तरह रोकना होगा। नालों का गंदा पानी साफ करने वाले सफाई यंत्रों को लगाना होगा। नदी के कछार में जैविक खेती को अपनाना होगा। मौजूदा हालातों में नदी तंत्र पर गंभीर खतरा है। नदियां सूख रही हैं और मरने वाली नदियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। यह संकट नदी तंत्रों के अस्तित्व के लिए खतरा है। यदि उस संकट की अनदेखी की तो अगले कुछ सालों में देश की सभी नदियां मौसमी बनकर रह जाएंगी। गंगा, यमुना, नर्मदा जैसी बड़ी नदियों की स्थिति खराब होगी।

बदलना होगी विकास की अवधारणा
सामाजिक कार्यकर्ता राकेश दीवान ने कहा कि मौजूदा समय में विकास की जो अवधारणा है उसे बदलनी होगी तभी नदियों को बचाया जा सकता है। भूविज्ञानी प्रो. धनंजय सराफ का सुझाव था कि इस संहिता में जियो फिजिक्स को भी जोडऩा होगा तभी प्रयास सार्थक होंगे। जल संसाधन विभाग के पूर्व अभियंता एसएस धोड़पकर ने रोजमर्रा के जीवन में पानी बचाने की जरूरत पर बल दिया। ओम प्रकाश भार्गव ने कहा कि नदियों को बचाने के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ आगे आना होगा। सीपी श्रीवास्तव ने इन कार्यों में युवा पीढ़ी को जोडऩे पर बल दिया।



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