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किसानों की मौत की वजहों को समझना ही नहीं चाहते सरकारें

भोपाल। गांधी भवन में सोमवार को समाज विज्ञानी व वरिष्ठ पत्रकार पी. साईनाथ का व्याख्यान हुआ। कृषि संकट- खाद्यान सुरक्षा एवं स्वास्थय विषय पर उन्होंने विचार रखे।

उन्होंने अपने व्याख्यान के दौरान रूरल मेडिकल प्रैक्टिसनर, लैंड एजुकेशन एक्ट, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना सहित अन्य विषयों पर चर्चा की। उन्होंने अपने शोधकार्यों का जिक्र करते हुए बताया कि साल 2000 में मैंने अनंतपुर में कई विजिट की हैं, जहां के कई किसानों ने आत्महत्या कर ली। इसकी मुख्य वजह क्या रही होगी, क्यों किसान इतनी आत्म हत्याएं कर रहे हैं, छोटे किसान ऐसा क्या झेल रहे हैं कि उन्हें आत्महत्या जैसा कदम उठाना पड़ रहा है।

यह तमाम बातें उन्होंने व्याख्यान के दौरान साझा की। महाराष्ट्र, तेलंगाना, नॉर्थ कर्नाटक में लगातार ड्रॉप आउट हो रहा है। क्योंकि वहां का युवा वर्ग अपने माता-पिता की हालत देख चुका है। पोस्ट मॉनसून की बात करें खेती के लिए तो (अक्टूबर-दिसंबर) के बीच में 40 प्रतिशत तक डेफीसिएंशि है, यहां तक कि मप्र खुद ही इससे प्रभावित राज्य है। ऐसे में किसान के पास क्या ऑप्शन रहते हैं।

कृषि क्षेत्र में निजी कंपनियों का कब्जा
इस मौके पर उन्होंने कहा कि, बात यदि बीज की करें तो उनके प्राइज, फर्टीलाइजर, पेस्टीसाइट से लेकर तमाम चीजें आज कंपनी के हाथ में है। 1991 में 50 किलो डाय अमोनिया फॉस्फेट (डीएपी) की कीमत 157 रुपए थी।

आज 45 किलो एक हजार चार सौ पचास रुपए हो गया। रेट बढ़ गया वेट गिर गया। यह तो मैं एक एलीमेंट बता रहा हूं। अब देखिए कि नेचुरल नेटिव सीड्स ऑफ कॉटन एक एकड भी नहीं बची अब वैसी। नौ रुपए पर किलोग्राम 1995 में, 450 ग्राम का 200 रुपए। 2004 में बीटी कॉटन का एक बैग चार हजार साढ़े सोलह से 18 सौ रूपए तक। पूरा किलो चार हजार रुपए।

 

नौ रुपए से चार हजार रुपए तक कैसे आम किसान इतना अफोर्ड करेगा। इसकी वजह है कॉलेप्स ऑफ इकॉनोमी, जैसे विदर्भ, केरल, अनंतपुर में हुआ। इसके अलवा ग्लोबलाइजेशन करके सबसे वीक सिटीजन है उसे कमजोर कर दिया।



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