दो मुट्टी चावल और गाड़ी बेचकर बेटा लेता है लकड़हारे का बदला
भोपाल। एसोसिएशन ऑफ थिएटर आट्र्स की ओर से रविवार को गांधी भवन में नाटक 'शेर पे सवा शेर' का मंचन किया गया। इसका निर्देशन और लेखन सुश्रुत गुप्त ने किया है। राजस्थानी लोक कथा पर आधारित इस नाटक की खासियत यह है कि नाटक के कलाकारों द्वारा लकड़ी की एक हाथ गाड़ी तैयार की गई है, जो बंगाली रिक्शे के आधार पर है। इसमें राजस्थानी वेशभूषा का उपयोग किया गया है। इस नाटक में 1879 की कहानी दिखाई गई है।
दो मुट्टी चावल बेचने जाता है लकड़हारा
एक गावं में लकड़हारा रहता है। वह अपनी गाड़ी से दो मुट्टी चावल में लकड़ी बेचने निकलता है और उस दो मुट्टी चावल से ही अपने परिवार का गुजारा करता है। लकड़हारा का बेटा पढ़ा-लिखा नौजवान है और अपने पिता को बार-बार समझाता है कि दुनिया बदल गई है तुम भी अपने को बदल डालो, लकड़ी को सही कीमत पर ही बेचो। लेकिन पिता कहता है कि मैं लोगों के घर को आबाद करता हूं हमारा गुजारा दो मुट्टी चावल में ही हो जाता है। एक दिन लकड़कारा साहूकार के यहां लकड़ी बेचने जाता है और दो मुट्टी चावल में साहूकार उसकी गाड़ी को भी जब्त कर लेता है। वह कहता है कि तुमने कहा था कि दो मुट्टी चावल में पूरी गाड़ी, अत: यह दो मुट्टी चावल लो और यहां से भागो। साहूकार के गुंडे उसे परेशान करते हैं और वह लुटा-पिटा अपने घर वापस आ जाता है।
लकड़हारे का बेटा खोलता है साहूकार की आंखें
नाटक में फिर मोड़ आता है। लकड़हारे का बेटा पूरा मांजरा समझ जाता है और वह नई गाड़ी बनाकर उसमें लकड़ी रखकर साहूकार के यहां बेचने जाता है। फिर साहूकार दो मुट्टी चावल रखकर पूरी गाड़ी रख लेता है। लकड़कारे का बेटा साहूकार से कहता है कि मैंने दो मुट्टी चावल में पूरी गाड़ी बेची है। अत: मुझे तुम्हारी दो मुट्टी चाहिए और हसिए से काटने को तैयार हो जाता है। फिर उसके घर में कोहराम मच जाता है तब साहूकार कहता है कि आज शेर पे सवा शेर मिला। लकड़हारे का बेटा साहूकार की आंखें खोल देता है।
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