MP में आर्थिक संकट! प्रदेश सरकार पर बढ़ा किसान कर्जमाफी और वचनों का बोझ
भोपाल. पहले से कर्ज में डूबे प्रदेश से आर्थिक आपातकाल के हालात तमाम प्रयासों के बावजूद दूर नहीं हो रहे हैं। सत्ता हासिल करने के महज ढाई महीने में कमलनाथ सरकार 4000 हजार करोड़ रुपए का कर्ज ले चुकी है।
सरकार मंगलवार को 1000 करोड़ रुपए का कर्ज खुले बाजार से लेने जा रही है। पहले चुनावी खर्च और बाद में किसानों की कर्जमाफी ने सरकारी खजाने की हालत को खराब कर दिया है। सरकार पर किसान कर्जमाफी के कारण 38000 करोड़ से ज्यादा का बोझ आना है।
दो महीने बाद ही लोकसभा चुनाव हैं, इसलिए सरकार ज्यादा से ज्यादा वचन पूरे करने पर भी ध्यान दे रही है। इसी कारण सरकार को कर्ज की राह पर जाना पड़ रहा है।
नई सरकार ने कब कितना कर्ज लिया
1000 करोड़ : 11 जनवरी
1000 करोड़ : 01 फरवरी
1000 करोड़ : 08 फरवरी
1000 करोड़ : 22 फरवरी
खजाने में ऐसे आते हैं रुपए
594000 करोड़ केंद्र से राज्य को कर में हिस्सा मिलता।
546555 करोड़ रुपए राज्य कर से मिलते हैं प्रदेश को।
11000 करोड़ रुपए नॉन टैक्स मद में आते हैं।
मितव्ययिता की सिर्फ बातें
मुख्यमंत्री कमलनाथ ने मंत्री-विधायकों और अफसरों को मितव्ययिता की नसीहत दी थी, लेकिन इसका पूरी तरह पालन नहीं किया गया। नए मंत्रियों ने आते ही बंगलों को नए सिरे से संवारना शुरू कर दिया। सरकारी आयोजनों में जरूर कमी की गई।
कैश फ्लो का पैसा निकालने से दिक्कत
चुनावी समय में पिछली सरकार ने कैश फ्लो का पैसा दूसरी स्कीम में इस्तेमाल किया था। इसके बाद से स्थिति और बिगड़ती गई। अभी भी कैश फ्लो की हालत ठीक नहीं है। हर महीने औसत 5000-6000 करोड़ कैश फ्लो सरकार के पास होता है।
इसमें हर महीने 2000 करोड़ वेतन, 1000 करोड़ पेंशन, 1000 करोड़ अध्यापक सवंर्ग और 1000 करोड़ ब्याज के लिए दिए जाते हैं। पिछली भाजपा सरकार ने इसका पैसा संबल व अन्य योजनाओं में दे दिया था।
प्रदेश पर कर्ज का लेखा-जोखा
160871.90करोड़ का कर्ज कुल
88491.64 करोड़ बाजार का कर्ज
7501.92 करोड़ नुकसानी व बांड कर्ज
10469.67 करोड़ बैंकिंग सेक्टर से कर्ज
15340.00 करोड़ केंद्रीय कर्ज व अग्रिम
15921.36 करोड़ अन्य जिम्मेदारियां
23147.31 करोड़ विशेष सुरक्षा-स्मॉल सेविंग फंड व अन्य
ओवर-ड्रा का खतरा
प्रदेश पर 15 साल बाद ओवर-ड्रा का खतरा मंडरा रहा है। यह खतरा पिछले साल अगस्त के बाद से ही गहरा गया था, जब तत्कालीन भाजपा सरकार ने चुनावी खर्च के बोझ तले लगातार कर्ज उठाया था।
चुनावी समय में ही तत्कालीन भाजपा सरकार ने 6000 करोड़ से ज्यादा का कर्ज लिया था, जबकि तमाम विकास कार्य ठप हो चुके थे। इससे पहले वर्ष 2003 में ओवर-ड्रा हुआ था। उसके बाद से स्थिति सुधरती गई, लेकिन अगस्त 2018 के बाद से स्थिति फिर बिगड़ रही है। अक्टूबर से दिसंबर तक तो सरकार के पास वेतन-भत्ते बांटने के लिए भी पैसा पर्याप्त नहीं था। इसके चलते कई जगह आकस्मिक निधि से वेतन बांटा गया।
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