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प्रभारी पर दिग्गज प्रत्याशी पड़ रहे भारी

जितेन्द्र चौरसिया, भोपाल. लोकसभा के रण में दिग्गज नेताओं के उतरने के कारण कांग्रेस और भाजपा के प्रदेश व चुनाव प्रभारियों की भूमिका सीमित रह गई है। प्रदेश प्रभारी और चुनाव प्रभारी न तो चुनाव में पूरी तरह सक्रिय भूमिका निभा पाते हैं और न ही दिग्गज प्रत्याशियों के मामले में दखल दे पाते हैं। वे पार्टी में भी लाख प्रयास के बावजूद अपनी बात नहीं मनवा पाते। यही कारण है कि पूरे चुनाव में इनकी भूमिका महज रस्म-अदायगी रह जाती है। कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी तो लगभग पूरी तरह चुनाव से बाहर हैं। हालांकि इसके पीछे उनका स्वास्थ्य खराब होना भी बड़ी वजह है, लेकिन मुख्य वजह दिग्गज नेताओं से पटरी नहीं बैठने के कारण उनकी दखलंदाजी बंद होना है। जानिए इनकी भूमिका की स्थिति...
- दीपक बावरिया, प्रदेश प्रभारी, कांग्रेस
बावरिया चुनाव के पहले खूब सक्रिय थे। दौरे किए और संगठन में कसावट लाए, लेकिन वे गुटबाजी के भंवर में उलझ गए। विंध्य में पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह के समर्थकों से विवाद के बाद बेपटरी हो गए। उनकी प्रदेश के अन्य बड़े नेताओं से भी पटरी नहीं बैठी। उनके कई बयान भी विवादित रहे। संगठन को उनके नियम भी रास नहीं आए। विधानसभा चुनाव के टिकट वितरण के समय कमलनाथ, दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया से उनके मतभेद उभरकर सामने आए। फरवरी अंत में ब्रेन-स्ट्रोक के कारण उनकी तबीयत बिगड़ी और में दिल्ली में अस्पताल में भर्ती हो गए। इसके बाद से उनकी प्रदेश में सक्रियता लगभग खत्म हो गई है। पूरा लोकसभा चुनाव उनकी गैर-मौजूदगी में ही संचालित हो रहा है। संगठन की कमान कमलनाथ ने ही संभाल रखी है।

- विनय सहस्त्रबुद्धे, प्रदेश प्रभारी, भाजपा
सहस्त्रबुद्धे की भूमिका भी संगठन में ज्यादा असरदार नहीं रही। पहले पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष राकेश सिंह के साथ तालमेल बैठाने में उनका अधिकतर समय निकला। दिग्गज नेता और लोकसभा चुनाव प्रत्याशी नरेंद्र सिंह तोमर, फग्गन सिंह कुलस्ते, वीरेंद्र खटीक, राकेश सिंह, प्रहलाद पटेल आदि के संसदीय क्षेत्रों में सहस्त्रबुद्धे का दखल लगभग नहीं है। हालांकि कांग्रेस से तुलना करें तो सहस्त्रबुद्धे ज्यादा असरदार रहे हैं। संगठन में उनकी सुनी जाती है। साथ ही उनके हिसाब से दूसरे दिग्गज नेता भी समन्वय करते हैं। भोपाल सीट पर प्रज्ञा भारती को उतारने और उसके बाद पार्टी संगठन को सक्रिय करने में सहस्त्रबुद्धे की भूमिका अहम रही है, लेकिन दूसरी लोकसभा सीटों पर उनकी भूमिका सीमित हैं।
- सुरेश पचौरी, लोकसभा चुनाव प्रभारी, कांग्रेस
लोकसभा चुनाव में बेहद देरी से पचौरी को प्रभारी बनाया गया। भोपाल लोकसभा सीट पर पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को उतारने के बाद पचौरी की नाराजगी को थामने के लिए यह कदम उठाने की चर्चा रही। पचौरी की चुनाव प्रभारी के तौर पर बेहद सीमित भूमिका अब तक दिखी है। भोपाल सीट पर चुनिंदा कार्यक्रमों में उनकी शिरकत रही। प्रदेश संगठन के चुनिंदा कार्यक्रम में भी पहुंचे, लेकिन इसके अलावा कहीं भी संगठनात्मक चुनाव प्रबंधन या अन्य किसी रणनीति में उनकी सक्रियता नहीं दिखी। दिग्गज नेताओं के बड़े कद के कारण भी वे सक्रिय नहीं हो पाए। मैदानी तौर पर तो अब तक वे लगभग निष्क्रिय ही रहे।
- स्वतंत्र देव सिंह, लोकसभा चुनाव प्रभारी, भाजपा
उत्तर प्रदेश के मंत्री स्वतंत्र देव सिंह को भाजपा ने जनवरी में मध्यप्रदेश का लोकसभा चुनाव प्रभारी बनाया था। इसके बाद से स्वतंत्र देव सिंह ने चुनिंदा दौरे ही प्रदेश के किए। शहडोल-बालाघाट सहित कुछ जगह समन्वय की जिम्मेदारी उनको विशेष तौर पर दी गई, लेकिन अभी तक उनकी मैदानी सक्रियता ज्यादा नहीं दिखी है। उत्तर प्रदेश के चुनाव में घिरे होने के कारण उनका मध्यप्रदेश में दखल व सक्रियता कम ही रहा। उस पर यहां के दिग्गज नेताओं को भी स्वतंत्र देव की दखलंदाजी पसंद नहीं। इस कारण वे पूरे चुनाव में बेहद सीमित भूमिका में रहे। ज्यादातर केंद्रीय संगठन के निर्देश पर ही काम करते दिखे।

स्वास्थ्य खराब होने के पहले पूर्णत: सक्रिय था, अभी डॉक्टरों ने किसी भी प्रकार का स्ट्रेस लेने से मना किया है। उनकी सख्त हिदायत है कि अभी पूर्णत: आराम करूं, इसलिए सक्रिय नहीं हो पा रहा हूं। केवल फोन पर वन-टू-वन सम्पर्क में रहता हूं।
- दीपक बावरिया, प्रदेश प्रभारी, कांग्रेस

चुनाव में प्रदेश प्रभारी व चुनाव प्रभारी सीधे तौर पर सक्रिय हैं, उनके कार्यक्रम हैं और बैठकें ले रहे हैं। पार्टी में कार्यकर्ता से लेकर हर नेता तक सक्रिय भूमिका रखता है। सबकी अपनी-अपनी भूमिका होती है, उसी हिसाब से काम करते हैं।
- राकेश सिंह, प्रदेश अध्यक्ष, भाजपा



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