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झीलों के शहर के साहित्यक फिजां में बसी है उषा जी की यादें

भोपाल. हिंदी-मैथिली साहित्य की सुप्रसिद्ध लेखिका पद्मश्री डॉ. उषा किरण खान का झीलों के शहर भोपाल से गहरा नाता रहा है। उनके अचानक चले जाने से साहित्य जगत स्तब्ध है। शोकाकुल साहित्यकारों का कहना है कि शहर की साहित्यक फिजां में डॉ. उषा किरण की यादें बसी हैं। यूं भी उनका शहर से ज्यादा जुड़ाव था। डॉ. खान की बेटी आइपीएस अफसर अनुराधा शंकर यहां पदस्थ हैं। इसलिए शहर में डॉ. खान का ज्यादा आना-जाना था। अगस्त २०२३ में वे शहर में थीं। मप्र उर्दू अकादमी के अफसाने का अफसाना के तहत कथा साहित्य की नवीन प्रवृत्तियां विषय पर वक्तव्य और कहानी पाठ का आयोजन किया था। वे इस कार्यक्रम में बतौर अतिथि उपस्थित थीं। कहानीकारों का हौसला बढ़ाते हुए तब उन्होंने कहा था-अफसाने का अफसाना यही है कि कहानियां कभी खत्म नहीं होतीं। साहित्य में अनेक विधाएं आईं, फिक्शन में भी कई विधाएं हैं लेकिन कहानी ऐसी जो कभी खत्म नहीं हो सकतीं यही अफसाने का अफसाना है। शहर के तमाम परिवारों और साहित्यकारों से उनके घनिष्ठ रिश्ते थे। उनके निधन से दुखी शहर के साहित्यकारों का कहना है उनके जाने से हिंदी और मैथिली साहित्य की एक दुनिया खाली हो गई। वे अपने अंतिम दिनों तक लिखती रहीं। बच्चों पर लिखा। नाटक लिखा, कहानियां, उपन्यास और आलेख और संस्मरण लिखा। यूं तो वे बिहार में जन्मीं और ज्यादातर वहीं सक्रिय रहीं लेकिन अपने रचना संसार से वह देश-विदेश के साहित्य प्रेमियों से जुड़ी रहीं। पद्मश्री जैसे प्रतिष्ठित सम्मान के अलावा उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार, हिन्दी सेवी सम्मान, महादेवी वर्मा सम्मान और दिनकर राष्ट्रीय सम्मान जैसे अनेक सम्मानों से नवाजा जा चुका है। बीते दिनों वह अपने नाती की शादी समारोह में भोपाल आई थीं। तब भी तमाम साहित्यकारों से उनकी मुलाकात हुई। उनके दो उपन्यासों 'हसीना मंजिल और अगन हिंडोला का उर्दू अनुवाद करने वाले जिया फारुकी आदि के साथ लंबी बैठकी हुई। वे हमेशा नवोदित साहित्यकारों को प्रोत्साहित करती थीं। उनके अंदर समाज के दबे कुचले वर्ग के लिए विशेष हमदर्दी थी। उनकी बातों में ममता की झलक नजर आती थी। समाज के हर वर्ग को लेकर वह हमेशा चिंतित रहती थीं। बेहद संवेदनशील उषा किरण के साहित्यक योगदान को शहर कभी भुला नहीं पाएगा।
(जैसा रिज़वानुद्दीन फ़ारुक़ी, युवा उर्दू लेखक और अनुवादक ने बताया)



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