भाजपा को याद आए बुजुर्गवार, नेताओं की आपसी खींचतान खत्म करेंगे चार नेता
भोपाल। भाजपा को आखिरकार अपने बुजुर्ग नेता याद आए हैं। सांसदों-विधायकों में मची खींचतान और नेताओं की बढ़ती गुटबाजी को थामने का जिम्मा संगठन ने चार बुजुर्ग नेताओं को दिया है।
इनमें से तीन तो ऐसे हैं जो प्रदेश संगठन महामंत्री जैसे अहम और अनुशासन से जुड़े पद पर रहे हैं तो वहीं एक पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं। इन नेताओं को संभागीय स्तर पर पार्टी के नेताओं और पदाधिकारियों के साथ बैठकें करने के लिए कहा गया है। इन बैठकों में संगठन में समन्वय स्थापित करने के साथ ही स्थानीय स्तर पर गुटबाजी खत्म करने का काम करेंगे।
हर संभाग में गुटबाजी, खींचतान-
बुजुर्ग नेताओं को समन्वय का काम देने के पीछे अहम कारण विधानसभा चुनाव के बाद पार्टी में बढ़ी आपसी खींचतान और गुटबाजी है। प्रदेश के लगभग हर संभाग में बड़े नेताओं के बीच विवाद और गुटबाजी की स्थिति है।
खंडवा लोकसभा में सांसद नंदकुमार सिंह चौहान और पूर्व मंत्री अर्चना चिटनीस आमने सामने हैं। सीधी में सांसद रीती पाठक और विधायक केदार शुक्ला के बीच का विवाद सड़कों पर आ चुका है।
दमोह में सांसद प्रहलाद पटेली की शिकायत विधानसभा चुनाव के दौरान गोपाल भार्गव ने की थी तो वहीं इंदौर में उषा ठाकुर और कैलाश विजयवर्गीय के बीच की खींचतान सार्वजनिक है। पार्टी के मिले फीडबैक के मुताबिक विधासभा चुनाव में सत्ता गंवाने के बाद ये विवाद और ज्यादा गहरा गए हैं। ऐसे में लोकसभा चुनाव में इनका असर पड़ सकता है।
संघ से संबध, जमीनी पकड़-
माखन सिंह : प्रदेश के पूर्व प्रदेश संगठन महामंत्री। संघ से सीधे कनेक्शन के साथ ही कार्यकर्ताओं पर प्रभाव। अनुशासन एवं सादगी के दम पर लोगों से काम कराने
की क्षमता।
कृष्ण मुरारी मोघे: प्रदेश संगठन महामंत्री रहे। खरगौन से सांसद और इंदौर के महापौर रहे। संघ के साथ ही भाजपा के जमीनी नेताओं तक सीधे संबंध। मालवा में अच्छी पकड़।
भगवत शरण माथुर: पूर्व सह संगठन महामंत्री। संघ का चेहरा। कई इलाकों में संभागीय संगठन मंत्री रहने के कारण वहां के नेताओं से अच्छे संबंध। विंध्य में अच्छी पकड़।
विक्रम वर्मा: पूर्व केंद्रीय मंत्री और प्रदेश अध्यक्ष रहे। मालवा-निमाड़ में वर्चस्व। अनुशासन एवं गंभीर छवि के नेता।
विधानसभा चुनाव में उठे थे सवाल-
विधानसभा चुनाव के दौरान विक्रम वर्मा को छोड़कर तीनों अन्य नेताओं को कोई अहम जिम्मेदारी नहीं सौंपी गई थी। सत्ता गंवाने के बाद हुई समीक्षा बैठकों मेंं भी यह विषय उठा था कि माखन सिंह और माथुर जैसे वरिष्ठ नेताओं के अनुभव का लाभ संगठन ने क्यों नहीं उठाया।
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