सियासी दांव-पेच : क्या आप जानते हैं अपने क्षेत्र के वोटरों का मिजाज! यदि नहीं तो ऐसे समझें...
भोपाल। मतदाताओं का मूड भांपना आसान नहीं है। जिसे पसंद किया उसे कई बार सदन तक पहुंचाया और जिसे एक बार नकार दिया तो दोबारा मौका ही नहीं दिया। खजुराहो, दमोह, टीकमगढ़ और भिंड लोकसभा क्षेत्र के मतदाताओं का मिजाज ऐसा ही है। इसके विपरीत ऐसे लोकसभा क्षेत्रों की संख्या अधिक है, जहां के मतदाता एक ही पार्टी को लगातार मौका देते रहे।
1. खजुराहो : यहां से रामसही, लक्ष्मीनारायण नायक, विद्यावति चतुर्वेदी, उमा भारती, सत्यव्रत चतुर्वेदी, रामकृष्ण कुसमरिया, जीतेन्द्र सिंह बुंदेला, नागेन्द्र सिंह सांसद रहे हैं। उमा, रामसही और विद्यावति तो लगातार एक से अधिक बार सांसद रही हैं, लेकिन यदि कोई उम्मीदवार चुनाव हारा या मैदान छोड़ा तो उसे दोबारा मौका नहीं दिया।
2. दमोह : पिछले 52 साल में यहां 13 लोकसभा चुनाव हुए। रामकृष्ण कुसमरिया चार चुनाव जीते। कुसमरिया को छोड़कर यहां से अन्य कोई नेता दूसरी बार जीत नहीं पाया। मतदाताओं ने हर बार नए चेहरे को चुना।
3. टीकमगढ़ : दो बार से भाजपा के वीरेन्द्र कुमार लगातार सांसद हैं। इसके पहले नाथूराम अहिरवार भी इस क्षेत्र से दो बार सांसद रह चुके हैं। इसके अलावा अन्य कोई यहां से लगातार सांसद नहीं चुना गया।
4. भिंड : यहां के मतदाता जिस सांसद से एक बार नजरें फेर लेते हैं, उसे दोबारा नहीं चुनते। वर्तमान में भागीरथ प्रसाद सांसद हैं। यहां अब तक हुए 14 लोकसभा चुनाव में केवल रामलखन सिंह लगातार चार बार सांसद चुने गए हैं।
इन पांच क्षेत्रों में एक ही चेहरा...
प्रदेश के पांच लोकसभा क्षेत्रों मतदाताओं ने अपने नेता पर लगातार भरोसा जताए रखा। इनमें इंदौर, जबलपुर, गुना, सतना और छिंदवाड़ा शामिल है। छिंदवाड़ा से कमलनाथ को नौ बार सांसद चुने गए। अब ये प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं।
वे अब छिंदवाड़ा से विधानसभा उपचुनाव लड़ेंगे। इसी तरह इंदौर में सुमित्रा महाजन लगातार आठ बार सांसद चुनी गईं। वर्तमान में वे लोकसभा अध्यक्ष हैं। गुना संसदीय सीट से ज्योतिरादित्य सिंधिया लगातार चार बार से सांसद हैं। राकेश ङ्क्षसह जबलपुर और गणेश सिंह सतना से लगातार तीन बार से सांसद हैं।
इधर, जीत की चाह में चेहरा बदल रहे सियासी दल...
वहीं दूसरी ओर लोकसभा चुनाव के लिए कांग्रेस के नौ और भाजपा के 15 नाम घोषित होने के बाद प्रदेश की 29 में से महज चार सीटों की तस्वीर साफ हुई है। कांग्रेस ने चारों जगह नए चेहरे उतारे हैं।
इनके सामने भाजपा के दो पुराने और दो नए चेहरे मैदान में होंगे। इन चारों सीटों में से शहडोल सीट पर कांग्रेस से भाजपा में आईं हिमाद्री सिंह और भाजपा से कांग्रेस में शामिल हुईं प्रमिला सिंह आमने-सामने हैं।
टीकमगढ़ : दिग्विजय खेमे की किरण से उम्मीद...
कांग्रेस-किरण अहिरवार : भाजपा-वीरेंद्र खटीक
कांग्रेस चेहरा बदला है। दरअसल, बुंदेलखंड की इस सीट पर केंद्रीय मंत्री डॉ. वीरेंद्र खटीक दो बार से काबिज हैं। कांग्रेस ने 2009 में वृंदावन अहिरवार और 2014 में कमलेश अहिरवार को उतारा था। कांग्रेस ने इस बार भी चेहरा बदला है। किरण अहिरवार को दिग्विजय खेमे का माना जाता है।
टीकमगढ़ लोकसभा क्षेत्र की आठों विधानसभा सीटों पर पिछले लोकसभा चुनाव में खटीक को बढ़त मिली थी, लेकिन विधानसभा चुनाव 2018 में आठ में से तीन पर कांग्रेस को जीत मिली है, इसलिए यहां कांग्रेस को उम्मीद है।
होशंगाबाद : दलबदल के तोड़ की तलाश...
कांग्रेस-शैलेंद्र दीवान : भाजपा-राव उदय प्रताप
कांग्रेस यहां भाजपा के दलबदल के दांव का तोड़ ढूंढ रही है। 2009 में राव उदय प्रताप सिंह कांग्रेस से सांसद थे। वे 2014 के चुनाव के पहले भाजपा में चले गए। फिर भाजपा से सांसद बने, तब कांग्रेस ने देवेंद्र पटेल को उतारा था। इस बार शैलेंद्र दीवान को प्रत्याशी बनाया है। यहां कांग्रेस को उम्मीद है कि उदय की कम सक्रियता के कारण उसे मौका मिल सकता है। वहीं, इस बार के विधानसभा चुनाव में यहां की आठ में से पांच सीटें कांग्रेस नेे जीती हैं।
बैतूल: ढाई दशक से जीत का इंतजार...
कांग्रेस—रामू टेकाम : भाजपा—दुर्गादास उइके
कांग्रेस को यहां ढाई दशक से जीत का इंतजार है। इसके लिए वह हर बार चेहरे बदलने का प्रयोग कर रही है। यहां 1991 में कांग्रेस से आखिरी सांसद असलम शेरखान थे। 1996 में असलम की हार के बाद से चेहरे बदलने का दांव शुरू हुआ, लेकिन उसे सफलता नहीं मिली।
इस बार भी जीत की संजीवनी तलाशने कांग्रेस ने छात्र राजनीति से आने वाले रामू टेकाम को मौका दिया है। विधानसभा चुनाव 2018 में यहां की आठ में से चार सीटों पर कांग्रेस को सफलता मिली है, इसलिए कांग्रेस को अपने पुराने गढ़ को वापस पाने की उम्मीद है।
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