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भोपाल गैस पीडि़तों को लेकर हाईकोर्ट में सुनवाई आज

भोपाल/जबलपुर. भोपाल गैस पीडि़तों के मामले में केंद्र और राज्य सरकार के अधिकारी अवमानना के दोषी पाए गए हैं। इस मामले में बुधवार को जबलपुर हाईकोर्ट में सुनवाई होगी। मप्र हाईकोर्ट के जस्टिस शील नागू और देवनारायण मिश्र की खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के भोपाल गैस पीडि़तों के स्वास्थ्य के मामले में ९ अगस्त 2012 में दिए गए आदेश की अवमानना में इन्हें दोषी पाया है। न्यायालय की अवमानना अधिनियम 1971 की धारा 2 के तहत मुकदता चलेगा। इस संबंध में 20 दिसंबर को ही आदेश जारी किए गए थे। सभी को 16 जनवरी तक जवाब देने को कहा गया था। लेकिन, अफसरों ने जवाब नहीं दिया।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश की लगातार अवमानना
कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकार के अधिकारियों को भोपाल गैस पीडि़तों को सही इलाज एवं शोध व्यवस्था न प्रदान कर पाने और सुप्रीम कोर्ट के भोपाल गैस पीडि़तों के स्वास्थ्य के मामले में कोर्ट के आदेश की लगातार अवमानना का दोषी पाया।
ये अधिकारी दोषी
१.स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के पूर्व सचिव राजेश भूषण
२.रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय की पूर्व सचिव आरती आहूजा
३.नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर रिसर्च ऑन एनवायर्नमेंटल हेल्थ, आईसीएमआरएस के संचालक डॉ. आरआर तिवारी
४.आइसीएमआर की पूर्व सीनियर डिप्टी संचालक आररामा कृष्णन
५.भोपाल मेमोरियल अस्पताल एवं रिसर्च सेंटर की पूर्व डायरेक्टर डॉ. प्रभा देसिकान
६.मप्र के पूर्व मुख्य सचिव इकबाल सिंह बैंस, ३० नवंबर २०२३ को रिटायर
७.मप्र स्वास्थ्य विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव मोहम्मद सुलेमान
८.आइएनसी के राज्य सूचना अधिकारी अमर कुमार सिंहा
९.आइएनसी एसआई विनोद कुमार विश्वकर्मा
कोर्ट की सख्त टिप्पणी, कहा-
पीआईएल की अवधारणा को मजाक बनाया
कोर्ट ने सभी अफसरों पर लगाए गए चार्ज में लिखा है कि "सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित निगरानी समिति के जुलाई 2023 की रिपोर्ट से यह स्पष्ट है कि साढ़े दस वर्ष से अधिक समय बीतने के बावजूद आप सभी प्रतिवादियों ने सर्वोच्च न्यायालय के साथ-साथ इस न्यायालय के निर्देशों का पालन करने में कोई तत्परता या ईमानदारी नहीं दिखाई। गैस पीडि़तों को अधर में छोड़ दिया जा रहा है। आप सभी प्रतिवादियों ने इन आदेश के अनुपालन की प्रक्रिया में इतनी ढिलाई बरती कि आप सभी ने (पीआईएल) की अवधारणा को एक मजाक बना दिया है।"
ढिलाई का कोई कारण नहीं
कोर्ट ने कहा कि इस न्यायालय को गैस पीडि़तों के प्रति आपकी असंवेदनशीलता को छोड़कर आपके उत्तरदाताओं की ओर से ढिलाई के पीछे कोई अच्छा कारण नहीं दिखता है।
युगलपीठ के एक सदस्य की अनुपस्थिति से सुनवाई टली
युगलपीठ के एक सदस्य की अनुपस्थिति के कारण सुनवाई एक दिन टल गई। अब बुधवार को सुनवाई होगी। दरअसल, उक्त अधिकारियों ने उनके विरुद्ध लगे अवमानना के आरोपों से मुक्त करने का आवेदन कोर्ट को दिया है। कोर्ट इस पर अगली सुनवाई के दौरान विचार करेगी। न्यायमित्र नमन नागरथ ने कोर्ट को बताया कि मॉनिटरिंग कमेटी के वकील को सरकार स्वीकृति नहीं दे रही है। उन्होंने दलील दी कि कमेटी सरकार के अधीन नहीं है। कमेटी कोर्ट के आदेश पर जांच कर रिपोर्ट पेश करती है, इसलिए सरकार और कमेटी का एक ही वकील नहीं हो सकता। कोर्ट ने सरकार को इस संबंध में अगली सुनवाई पर जवाब पेश करने के निर्देश दिए।
इस तरह की अनियमितता
सुप्रीम कोर्ट ने 2012 में गैस पीडि़तों के उपचार और पुनर्वास के संबंध में 20 निर्देश दिए थे। इनके क्रियान्वयन के लिए मॉनिटरिंग कमेटी गठित करने को कहा था। कमेटी को हर तीन माह में रिपोर्ट हाईकोर्ट को देनी थी। लेकिन मॉनिटरिंग कमेटी की अनुशंसाओं पर कोई काम नहीं हुआ।
अफसरों पर आरोप
गैस पीडि़तों के हेल्थ कार्ड नहीं बने
अस्पतालों में उपकरण व दवाएं उपलब्ध नहीं
बीएमएचआरसी के भर्ती नियम तय नहीं
डॉक्टर व पैरामेडिकल स्टाफ स्थाई तौर पर सेवाएं नहीं दे रहे
इस तरह अवमानना
कम्प्यूटीकरण और डिजिटलीकरण की जिम्मेदारी राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र ने नहीं निभाई
अतिरिक्त मुख्य सचिव मोहम्मद सुलमान ने प्रक्रिया पूरी नहीं करवाई
मॉनिटरिंग कमेटी को स्टेनोग्राफर उपलब्ध नहीं कराए गए
बीएमएचआरसी को एम्स में नहीं बदला गया।
बीएमएचआरसी के लिए स्वीकृत 1,247 पदों में से 498 पद रिक्त है
अधिकारियों ने गैस पीडि़तों को बेसहारा छोड़ दिया
कोर्ट के आदेश के परिपालन में तत्परता व ईमानदारी से काम नहीं हुआ
गैस पीडि़तों के प्रति असंवेदनशीलता दिखाई गई
गैस पीडि़त संगठनों ने स्वागत किया कहा-
दोषी अफसरोंं की सजा मिसाल बने
उधर, भोपाल ग्रुप फॉर इनफार्मेशन एंड एक्शन की रचना ढिंगरा ने बताया कि 20 दिसंबर को कोर्ट ने यह निर्णय सुनाया था। इसके बाद अधिकारियों को नोटिस भेजे गए थे। उन्होंने कहा-कोर्ट के आदेश का सभी गैस पीडि़त संगठन स्वागत करते हैं। इस आदेश को मिसाल बनाना चाहिए, ताकि जिन अफसरों के कारण गैस पीडि़तों की स्वास्थ्य व्यवस्था की यह हालत बनी उससे सबक मिले। अधिकारियों को मिसाल दायक सजा भी मिलनी चाहिए।



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